बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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नकली शाश्वत मुस्कान को ओढ़े,
बहुत से चेहरे आज भी मिलेंगे
जो आंधियों की ठिठाई के खिलाफ,
बड़े हुनर से दौड़ते आते हैं नजर।
मैं जब हिकारती नजरों से देखती हूँ उनको,
मेरी अपनी आत्मा दबोच लेती है मुझे
नहीं देखने देती आकाश को,
बड़ा स्याह मंजर बन जाता है उस वक़्त।
नकली मुस्कान चली जाती है,
अंधे कुएँ की मुंडेर तक
दबा देती है जिस्मों की चीख को भी।
मैं खुद को रचने में लग जाती हूँ,
मेरी आत्मा खींचती है लकीर संस्कृति की,
तब तक रावण रेखाओं के पार चले जाते हैं।
आखिर नकली मुस्कान,
भीतर और ऑक्सीजन भर के
राख पोत जाती है सबके चेहरों पर॥