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माता-पिता ही मेरी ताकत

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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हमारा भविष्य, ताकत और प्रेरणा (विश्व माता-पिता दिवस विशेष)…

उनके जीवन में हमारा भविष्य, ताकत और प्रेरणा क्या थी। माता-पिता अपने बच्चों के लिए एक शक्ति के रूप में प्रकट होते हैं। उनसे अगाध प्रेरणा मिलती रहती है। दोनों का रिश्ता अटूट सम्बन्ध के लिए होता है। १ जून ‘माता-पिता दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। माता-पिता धरती पर भगवान के रूप में आते हैं। बच्चों के लिए वे भगवान ही होते हैं। उनके त्याग, उनका सम्मान, उनकी सराहना के लिए ही १ जून उनकी याद में मनाया जाता है। उन्हें ‘मातृ देवो, पितृ देवो भव’ कहा जाता है। धर्म क्या है, धारण करने योग्य तो सबसे बड़ा धर्म माता-पिता की सेवा ही है। जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है माता-पिता की सेवा करना। यह सेवा भाव ही आशीर्वाद के रूप में हर क्षण मिलता रहता है।
    ज़िंदगी की कठिन पगडंडियों पर चलते समय श्रवण कुमार मातृ-पितृ की भक्ति के लिए विश्व-विख्यात हैं। उन्होंने अपने अंधे माता-पिता को काँवर के सहारे तीर्थ स्थानों के दर्शन करवाए। आज तक उनकी इस मेहनत को याद किया जाता है, क्योंकि उन्होंने माता-पिता के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया।
ऐसे ही श्री राम ने भी अपने पिता की आज्ञा मानते हुए १४ वर्ष का वनवास कबूल किया।
  बच्चों के प्रति माँ की श्रद्धा और ममता असीमित होती है। माँ का प्रेम, त्याग, मार्गदर्शन और उनका समर्पण एक प्रेरणा है, एक प्रकाश पुंज है। माँ हर समय अपने बच्चों के लिए सतत प्रयासरत रहती है और पिता हर क्षण मेहनत करते हैं, कि कैसे अपने बच्चों का भविष्य सुनिश्चित करें, जिससे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सम्मान पूर्वक जीवन जी सकें।
माता-पिता का सम्मान करना एक बड़ी बात है। माँ-पिता अपने बच्चों के पालन-पोषण में अपनी सारी ताकत लगा देते हैं, फिर भी उनको संतोष नहीं मिलता है। उन्हें लगता है कैसे उनका दुःख-दर्द अपने में समेट ले, जिससे उन पर जरा भी आँच नहीं आए। संतान पूरी ज़िंदगी सम्मान पूर्वक जीए, उसके लिए वो बड़ी-से-बड़ी त्याग करने में भी नहीं हिचकिचाते। भारत की संस्कृति में माता-पिता श्रेष्ठ शुभचिन्तक हैं। कोई भी माँ-पिता का स्थान नहीं ले सकता है।
  आज बच्चों की दुनिया बदल रही है। भावात्मक संतुलन के लिए हमारा भविष्य ताकत और प्रेरणा है। मेरे पिता नारियल की तरह थे। उनके मन को थोड़ा भी समझें तो देख सकते हैं कि उस दौर में पिता अपने बच्चों पर खुले रूप में प्यार नहीं व्यक्त कर सकते थे, लेकिन उनका सम्पूर्ण जीवन बच्चों के भविष्य के इर्द-गिर्द घूमता था। उनका मूल मंत्र था ‘करो या मरो’। मैं अभी भी उनके आदर्शों पर चलती हूँ।
बाबू जी के बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है। मेरे जीवन की नींव उनकी ही दी हुई है। बचपन की अनगिनत यादें हैं, जो समय-समय पर स्मृति पटल पर उपस्थित हो ही जाती हैं। उनका प्यार, स्नेह, इमोशनल डांटना आदि अभी भी स्वप्न में आकर मेरी समस्याओं का निदान कर ही जाते हैं। मेरे मार्गदर्शक मेरे माता-पिता थे। आज तकनीकी क्रांति के कारण जीवन में बहुत सुविधाएं मिली हैं, जिससे शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, सामाजिक हर तरह का विकास होता रहता है और जीवन सुचारू रूप से चलता रहता है। फिर भी मैं यही कहूँगी, कि माता-पिता मेरे भविष्य और जीवन के लिए ताकत और प्रेरणादायक हैं और रहेंगे। उनको बहुत-बहुत नमन।