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‘जल ही जीवन’, फिर भविष्य प्यासा क्यों ?

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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‘जल ही जीवन’ है यही विश्वास मानव का,
बूंद-बूंद का महत्व है आजीवन पानी का

जैसे पानी बिना मछली नहीं,
वैसे ही पानी बिना जीवन नहीं।

चारों तरफ हाहा-कार मचा बिन पानी,
बादल जब बरसें तो जग झूमने लगे खुशी-खुशी।

नज़र आए चारों तरफ हरियाली ही हरियाली,
प्यास बुझा कर नव जीवन प्रदान करती।

जीवन में एक-एक बूंद जल अनमोल और है कीमती,
बिन पानी सभी काम रुक जाएं, जैसे-जीवन की गति।

नहाना, धोना, खाना-पीना, वस्त्र- बर्तन की साफ-सफाई,
रुक जाए धारा जो अनिवार्य है जीवन की।

पेड़-पौधे सूख जाएं बिन पानी,
खेती-बाड़ी पर बुरा प्रभाव पड़े बिन पानी।

जीवन का आधार है जल, इसके बिना मुश्किल,
असम्भव है मधुर कल्पनाएं जीवन की।

भविष्य प्यासा हो जाएगा, अगर हम समझे नहीं,
पेड़-पौधे काटे जाएं, रहे मनमानी।

जल ही जीवन है फिर भविष्य क्यों प्यासा ?
मानव ने ही इस दुर्गति का इतिहास रचा।

मनमाने पानी को लुटाया, सोचा नहीं जरा भी,
एक दिन ऐसा आएगा, हो जाएंगे प्यासे सभी।

भविष्य नहीं देखा और न सोचा क्या होगा आगे-आगे,
पानी बिना चारों ओर सूने-सूने सभी।

बच्चों के लिए छोड़ा नहीं पानी का एक कतरा भी,
बोलो जरा, जल बिन कैसे रहें जीव सभी।

अपनी भौतिक उन्नति के लिए ही,
बनाए ऊँचे-ऊँचे महल, रोड, फैक्ट्री।

फैक्टरी के कचरे से हो गए दूषित तालाब-नदी,
अब करे यह एक पेड़ काटें, लगाएं दूसरी।

पानी का संरक्षण आवश्यक अति,
इसके लिए संकल्प शक्ति जरूरी।

पानी को संग्रह करना जरूरी, बरसात का भी पानी,
समुद्र के पानी को भी पीने योग्य होगा बनाना।

बूंद-बूंद से सागर बनता, बनता जीवन,
बूंद-बूंद की बर्बादी से बनता रेगिस्तान॥