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हाय रे! प्रसाधन कक्ष….

राधा गोयल
नई दिल्ली
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    “ओए, जल्दी बाहर निकल। मुझे भी जाना है।”
    ” अरे, रुक जा ना। पहले पेट तो साफ हो लेने दे, तभी तो बाहर निकलूँगा।”
    ” जल्दी कर, मुझे भी बहुत तेज प्रैशर लगा हुआ है।”
   “मुझे ब्रश करना है। ऑफिस जाने को देर हो रही है।”
    “अरे बच्चों, जल्दी करो। मुझे नहाना है। ऑफिस जाने को देर हो रही है।”
    “अरे रुको ना पापा, बीच में ही कैसे आ जाऊँ। पेट तो साफ होने दो।”
    “नीरज, जल्दी बाहर निकल। जल्दी बाहर निकल। अंदर ही डेरा जमाकर बैठ गया है।”
   ” अरे, सबने शोर मचा-मचाकर मेरा दिमाग खराब कर दिया है। हाथ तो धो लूँ।”
   “हाथ बाद में धोना। मेरी निकलने वाली है।”
   “तुम्हारी माँ का दिमाग खराब था। लोगों के बाथरूम कितने अच्छे होते हैं, कितने सुंदर होते हैं। वहीं पर बुक स्टैंड भी होता है। आराम से बैठकर अखबार पढ़ लो। अब पढ़ लो अखबार! रोजाना सुबह-सुबह घर में इसी बात का शोर मचा रहता है। अच्छा भला इंग्लिश टॉयलेट था। शौचालय, स्नानागार, वॉशबेसिन… सब अलग था। ३ लोग एक बार में काम कर लेते थे। पता नहीं, तुम्हारी माँ के दिमाग में कौन सा भूत सवार हो गया। दुनिया को दिखाने के लिए पुराना सब तुड़वा कर आधुनिक प्रसाधन कक्ष बनवाया है। अब कर लो सारे वहीं बैठकर प्रसाधन। अपनी माँ से ही पूछो, जिसे प्रेशर लग रहा है वो कहाँ जाए ? मुझे ब्रश करना है, तो कहाँ जाकर करूँ ? नहाना है तो कहाँ नहाऊँ। एक जने ने बाथरूम घेर लिया है। बाकी सारे खड़े टाप रहे हैं। अब ना तो टाइम से तुम लोग स्कूल जा पाओगे, न ही मैं दफ्तर।” 
  “पापा, इसको तुड़वाकर पहले की तरह से ही बनवा लो।”
  “पहले अपनी माँ से पूछ लो। कहीं उनकी सहेलियों के सामने उनकी शान में कमी ना आ जाए।”
   “पापा! मम्मी को हम देख लेंगे। रोज-रोज की इस परेशानी से हम भी तंग आ चुके हैं। बहुत हो चुका दुनिया को दिखाने का दिखावा। हमने अपनी सहूलियत देखनी है या दुनिया को दिखाना है ?”
   “बेटा, मैं तो पैसे खर्च कर सकता हूँ। घर की प्रबंधक तुम्हारी माँ है। मेरी हिम्मत नहीं है उससे यह सब कहने की। तुम ही कहो। मैं तो काम करवा सकता हूँ।”
    ” ठीक है पापा। अब हम ही बात करेंगे। पहले आपस में मिलकर विचार-विमर्श कर लेते हैं कि किस तरह से काम कराना है, ताकि सारी गतिविधियाँ आराम से चलती रहें।”
   “ठीक कह रहे हो बच्चों, शाम को आकर इस बारे में बात करेंगे। अरे जल्दी बाहर निकलो। बहुत देर हो रही है।”