राधा गोयल
नई दिल्ली
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“बच्चों !मेरे पास आकर बैठो। मुझे कुछ कहना है।”
“क्या बात बता रही हो दादी ?”
“सफाई के एक अनोखे मॉडल के बारे में।”
“क्या है वह सफाई का अनोखा मॉडल ? कहाँ,किस राज्य में है ?”
“उससे पहले यह सुनो कि उनका कहना है “कचरा लेकर आओ, साइकिल लेकर जाओ।”
“वाह, क्या बात है। फिर तो बहुत से बच्चे इस काम के लिए आगे आए होंगे।”
“बिल्कुल आए हैं।”
“लेकिन कहाँ की बात है ?”
“तमिलनाडु के कन्याकुमारी की।यहाँ १३५० छात्र ७ साल से समुद्र साफ कर रहे हैं। ४८ गाँवों ने खुद को प्लास्टिक मुक्त कर लिया है, साथ ही पर्यटकों के लिए ६ बीच तैयार कर दिए हैं। करीब १५ किलोमीटर में फैले मछुआरों के गाँव के इन बीच पर पहले सिर्फ मछलियाँ ही पकड़ी जाती थीं। अब रोज यहाँ २५०-३०० पर्यटक पहुँच रहे हैं।”
“क्या सरकार इनकी मदद कर रही है या कोई एनजीओ यह काम करवा रहा है ?”
“नहीं, यह सब बिना किसी एनजीओ के प्रयास या सरकारी फंड के हुआ है। यहाँ नेगिजी इल्ला नेथल पड़ई (प्लास्टिक मुक्त तटीय ब्रिगेड) नाम की पूरी सेना काम कर रही है।”
“अब यह काम भी सेना के जिम्मे लगा दिया ?”
“अरे नहीं। सेना से मतलब वह नहीं, जो देश की सुरक्षा में तैनात सैनिक हैं। इसमें ८५० विद्यालयीन बच्चे और ५०० ग्रेजुएट हैं। यह सभी इन्हीं गाँवों के हैं। यह हर वीकेंड पर समूह बनाकर गाँव व तट को साफ करते हैं। ७ सालों से चल रही यह मुहिम अभियंता मेल्बिन राबिन ने २०१९ में शुरू की थी।”
“उन्हें यह विचार क्या सोच कर आया।”
“तुम्हें पता होगा कि एक बार २०१७ में ओखी चक्रवात आया था और उसने बहुत तबाही मचाई थी। रोबिन के २ भाई भी इस चक्रवात में मारे गए थे। चक्रवात के बाद उन्होंने देखा कि प्लास्टिक के मलबे की वजह से ज्यादा तबाही हुई थी। बस इसी बात को देखकर उन्होंने संकल्प लिया कि हमें कुछ ऐसा करना चाहिए कि दोबारा ऐसा चक्रवात आए तो इस प्रकार का विनाश ना हो, क्योंकि ज्यादा विनाश प्लास्टिक के मलबे की वजह से हुआ था। शुरुआत में २ दोस्तों के साथ तट की सफाई शुरू की। उसके बाद धीरे-धीरे बहुत से बच्चे जुड़ गए। यह समूह तटीय क्षेत्र के ८० फीसदी हिस्से को साफ कर चुका है।
गाँव के घरों में २ डस्टबिन रखे जाते हैं। इनके निरंतर प्रयासों की बदौलत समुद्र साफ दिखने लगा है।
कई बच्चे तो ऐसे हैं, जो चौथी कक्षा से ही यहाँ सफाई कर रहे हैं। कई बार तो छुट्टी वाले दिन पूरा दिन समुद्र के किनारे से प्लास्टिक हटाने में बिताते हैं।
वालंटियर्स ने मछुआरों को तैयार किया है कि वह समुद्र में इस्तेमाल किए गए प्लास्टिक वापस जमीन पर लाएं। अब तक इस टीम ने तटों से ७४०० किलो प्लास्टिक कचरा हटाया है। इसके साथ ही चक्रवात प्रभावित क्षेत्रों में १२०० से अधिक नारियल और जामुन के पेड़ लगाए हैं।
यह ग्रुप किसी से फंडिंग या मदद नहीं माँगता। इकट्ठा किए प्लास्टिक को बेचकर जो पैसा मिलता है, उसी से वॉलिंटियर्स के लिए दस्ताने, जूते और सफाई के उपकरण खरीदते हैं।
मछुआरों के बच्चों की यह ब्रिगेड सिर्फ सफाई नहीं करती; बल्कि लोगों का व्यवहार बदल रही है। उन्होंने डोर टू डोर दूध के पैकेट कलेक्शन के शुरुआत की है। पिछले साल सिर्फ ३ गाँव से ही ५ लाख से ज्यादा दूध के पैकेट इकट्ठा करके रिसायकल के लिए भेजे गए। जो परिवार सबसे ज्यादा प्लास्टिक रिसायकल करता है, उसे यह ब्रिगेड साइकिल या अन्य जरूरी घरेलू सामान उपहार में देती है।”
“यह तो वो लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। यदि सभी ऐसा करने लगें, तो कितना अच्छा हो।”
“बिल्कुल कर सकते हैं बेटा। हर काम करने के लिए जुनून और इच्छा शक्ति चाहिए।” दादी ने कहा।