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पर्यटन के बोझ से कराहते पहाड़

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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मैदानी क्षेत्र से उमड़ती भीड़ हिमालयी तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी बनती जा रही है। भीषण गर्मी से निजात पाने के लिए अपनी- अपनी गाड़ियों में भागती भीड़ के कारण पहाड़ों की फिजा भी गर्म हो रही है। यातायात जाम का तो यह हाल है, कि रोहतांग दर्रे से मंडी तक लंबा जाम लग रहा है। शिमला हो या मनाली या मसूरी, हर जगह लाखों की तादाद में वाहन पहुँच रहे हैं। ये सारे पर्यटन स्थल भीड़ के बोझ से कराह रहे हैं। वाहनों से निकलता धुआँ और बढ़ता प्रदूषण वहाँ की स्वच्छ वायु को भी प्रदूषित कर रहे हैं।
    आस्था के नाम पर चारों धाम की यात्रा में रिकॉर्ड श्रद्धालु पहुँच रहे हैं।सरकारी आँकड़ों के अनुसार केदारनाथ में १२ लाख और बद्रीनाथ धाम में ११ लाख श्रद्धालु १२ जून तक दर्शन कर चुके हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है, कि पर्वतीय क्षेत्रों की वहन क्षमता सीमित होती है। और भीड़ है कि बढ़ती ही जा रही है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों के पहुँचने से कचरा, जल संकट, यातायात व्यवस्था और पर्यावरणीय दबाव बढ़ रहा है।
जोशीमठ से केवल एक महीने में ३ टन प्लास्टिक कचरा एकत्र किया गया, जिसमें अधिकांश पानी की बोतलें थीं। केदारनाथ क्षेत्र में बढ़ती हवाई यात्राएं कॉर्बन उत्सर्जन और शोर पर्यावरण के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी दे रहे हैं, कि मसूरी, नैनीताल और शिमला जैसे पहाड़ी शहर अपनी वहन क्षमता पार कर चुके हैं।
मनाली में सीमेंट आधारित निर्माण ५ प्रतिशत से २५ प्रतिशत तक पहुँच चुका है। जलवायु परिवर्तन पर हिमालय क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है, कि पहाड़ों पर कांक्रीट आधारित अंधाधुंध निर्माण कार्य पर सख्ती से परहेज करना होगा। और वहाँ पारंपरिक और स्थानीय सामग्री आधारित पर्यावरण के अनुकूल निर्माण कार्य को बढ़ावा देना होगा।
नीति आयोग, गोविंद वल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान  और अन्य वैज्ञानिक संस्थान की रिपोर्ट्स भी अनियंत्रित पर्यटन और जंगलों के विनाश से हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र नुकसान होने की गंभीर चेतावनी देते रहे हैं।
   हम सबके साथ सरकार को भी विचार करने की जरूरत है, कि तीर्थयात्रा और पर्यटन का उद्देश्य प्रकृति का दोहन करना नहीं होना चाहिए। पहाड़ों की वहन क्षमता को ध्यान में रखते हुए यात्रियों की संख्या पर नियंत्रण, कड़े कचरा प्रबंधन और पर्यावरण के अनुकूल विकास की आवश्यकता है।
यदि हम इसी तरह आँख बंद कर बैठे रहे, तो किसी दिन केदारनाथ आपदा जैसी दुर्घटना पर हम सभी फिर अपने हाथ मलते रह जाएंगें।