शीला बड़ोदिया ‘शीलू’
इंदौर (मध्यप्रदेश )
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जोर-जोर से बिजली चमक रही थी, तेज बारिश हो रही थी, खिड़की का दरवाजा बार-बार अंदर बाहर होकर आवाज कर रहा था, इतने में लाइट चली गई।
“मम्मी, मम्मी कहाँ हो आप ? जल्दी आकर, देखो! खिड़की के पास कोई खड़ा है। उसके लंबे हाथ मुझे पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। बचाओ, मुझे बहुत डर लग रहा है।” मालती ने जल्दी से टॉर्च ढूंढ कर जलाई और किचन से डुग्गू के कमरे की तरफ दौड़ी।
“डुग्गू तुम ठीक हो ना ?” जैसे ही कमरे में टॉर्च की लाइट आई, डुग्गू दौड़कर माँ से चिपक गया।
“मम्मी वहाँ देखो, वहाँ देखो, कौन है ? मुझे बहुत डर लग रहा है।” मालती भी घर में अकेली थी। वरुण अभी ऑफिस से लौटा नहीं था और तेज बारिश हो रही थी, अंधेरा हो चुका था।
मालती खिड़की की तरफ जाती है और खिड़की खोलकर बाहर की तरफ टॉर्च की लाइट में झांकती है, लेकिन उसे दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता है। “डुग्गू यहाँ तो कोई भी नहीं है। तुमने किसको देखा ? कैसा दिखाई दे रहा था ?”
डुग्गू बोला, “मम्मा, वह बहुत लंबा था, उसके दांत बड़े-बड़े थे और उसके लंबे हाथ मुझे पकड़ने मेरी तरफ आ रहे थे।”
मालती चिल्लाई, “कौन है ? यदि कोई हो, तो सामने आओ।” लेकिन कोई होता तो सामने आता। मालती को समझने में देर नहीं लगी कि डुग्गू अंधेरे में अपनी कल्पना से डर गया। उसने डुग्गू को समझाया, “बेटा कोई भी नहीं है। तुमने डर के मारे, अंधेरे में जैसा सोचा, वैसा तुम्हें दिखाई दिया और तुम उससे डर गए।
कभी-कभी हम मन में जैसा सोचते हैं, विचार करते हैं, वह हमें हमारी कल्पना में वास्तविकता जैसा दिखाई देता है। यदि हम अच्छा सोचेंगे तो हमें अच्छा और बुरा सोचेंगे तो हमें बुरा प्रतीत होता है, इसलिए हमेशा सकारात्मक सोचना चाहिए और अंधेरे से डरना नहीं चाहिए।”
डुग्गू बोला, “सॉरी मम्मी, अब मैं कोशिश करूंगा, कि अंधेरे से नहीं डरूं।”
“शाबाश डुग्गू, अब मैं जल्दी से खाना बना लेती हूँ, तुम्हारे पापा आने ही वाले होंगे।”
परिचय-शीला बड़ोदिया का साहित्यिक उपनाम ‘शीलू’ और निवास इंदौर (मप्र) में है। संसार में १ सितम्बर को आई शीला बड़ोदिया का जन्म स्थान इंदौर ही है। वर्तमान में स्थाई रूप से खंडवा रोड पर ही बसी हुई शीलू को हिन्दी, अंग्रेजी व संस्कृत भाषा का ज्ञान है, जबकि बी.एस-सी., एम.ए., डी.एड. और बी.एड. शिक्षित हैं। शिक्षक के रूप में कार्यरत होकर आप सामाजिक गतिविधि में बालिका शिक्षा, नशा मुक्ति, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, बेटी को समझाओ अभियान, पेड़ बचाओ अभियान एवं रोजगार उन्मुख कार्यक्रम में सक्रिय हैं। इनकी लेखन विधा-कविता, कहानी, लघुकथा, लेख, संस्मरण, गीत और जीवनी है। प्रकाशन के रूप में काव्य संग्रह (मेरी इक्यावन कविता) तथा १५ साझा संकलन में रचनाएँ हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी को स्थान मिला है। इनको मिले सम्मान व पुरस्कार में गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड सम्मान (साझा संकलन), विश्व संवाद केंद्र मालवा (मध्य प्रदेश) द्वारा सम्मान, कला स्तम्भ मध्य प्रदेश द्वारा सम्मान, भारत श्रीलंका सम्मिलित साहित्य सम्मान और अखिल भारतीय हिन्दी सेवा समिति द्वारा प्रदत्त सम्मान आदि हैं। शीलू की विशेष उपलब्धि गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में रचना का शामिल होना है। आपकी लेखनी का उद्देश्य साहित्य में उत्कृष्ट लेखन का प्रयास है। मुन्शी प्रेमचंद, निराला, तुलसीदास, सूरदास, अमृता प्रीतम इनके पसंदीदा हिन्दी लेखक हैं तो प्रेरणापुंज गुरु हैं। इनका जीवन लक्ष्य-हिन्दी साहित्य में कार्य व समाजसेवा है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“हिन्दी हमारी रग-रग में बसी है।”