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बरखा रानी, खुशियों की रवानी

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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कभी लगे बरखा रानी,
कभी लगे बरखा बैरन।

तप्त धरा पर जब बरखा बरसे,
तब लगे बरखा रानी
ठंडी-ठंडी हवाएँ संग-संग लाए,
हर मन में खुशियों की नई रवानी।

मन में उमंगों की लहरें उठें,
हर हृदय हर्ष से भर जाए
धरती पर हरियाली छा जाए,
मुरझाए पेड़-पौधे फिर मुस्काएँ।

किसान प्रफुल्लित होकर,
खेतों में हल-बैल चलाएँ
पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सब,
मगन होकर गीत सुनाएँ।

मोर घनघोर बादल देखकर,
पंख फैलाकर नाच उठे
कोयल अपनी मीठी तान सुनाए,
मन के सूने कोने महक उठें।

ठंडी-ठंडी मस्त हवाएँ,
तन-मन को सहला जाएँ
भीगी मिट्टी की सौंधी खुशबू,
बीती यादें फिर ताज़ा कर जाए।

इन्द्रधनुष भी बादलों की ओट से,
सतरंगी छटा बिखेर जाए
प्रकृति का अनुपम यह सौंदर्य,
हर मन को मोहित कर जाए।

लेकिन जब बरखा सीमा पार कर जाए,
तब वही बरखा बैरन बन जाए
खेत-खलिहान पानी में डूब जाएँ,
किसानों की मेहनत बह जाए।

झोपड़ियाँ टूटकर बिखर जाएँ,
पेड़-पौधे आँधियों में गिर जाएँ
छोटे-छोटे पशु-पक्षी भी
पानी के वेग में बह जाएँ।

घोंसलों के नन्हें पंछी
घर-विहीन हो जाएँ
मानव, पशु और प्रकृति सब,
विपदा के आँसू बहाएँ।

बरसा का हर रूप निराला है,
प्रकृति का अनुपम उपहार है
संतुलित हो तो जीवनदाता,
अति हो तो संहार है।

कभी लगे बरखा रानी,
कभी लगे बरसा बैरन।
प्रकृति के हर रूप का,
करना हम सबको आदर॥