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‘गुरु’ ईश्वर समान

बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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जीवन निर्माता… (गुरु पूर्णिमा विशेष)…

गुरु केवल एक व्यक्ति नहीं,
वे उस प्रकाश का नाम हैं
जो भीतर की अँधेरी सुरंगों में,
पहली किरण बनकर उतरता है।

ईश्वर दिखाई नहीं देता,
पर गुरु का स्पर्श
उस अदृश्य करुणा का अनुभव करा देता है
वे हाथ पकड़कर नहीं,
विश्वास जगाकर चलना सिखाते हैं।

जब मन संशयों से भर जाता है,
जब दिशाएँ धुँधली पड़ने लगती हैं,
तब गुरु
दीपक की लौ नहीं,
पूरा आकाश बन जाते हैं।

वे अक्षरों में अर्थ भरते हैं,
ज्ञान में विनम्रता
सफलता में संयम,
और संघर्ष में धैर्य का संबल देते हैं।

उनकी वाणी,
शास्त्रों की प्रतिध्वनि नहीं
जीवन का अर्जित सत्य होती है,
वे केवल उत्तर नहीं देते,
प्रश्न करने का साहस भी देते हैं।

ईश्वर भाग्य लिखता है,
गुरु उसे पढ़ने की दृष्टि देते हैं
ईश्वर जीवन देता है,
गुरु जीवन का उद्देश्य।

उनके चरणों में झुकना,
किसी व्यक्ति के आगे झुकना नहीं
ज्ञान, संस्कार और सत्य के प्रति,
अपनी श्रद्धा अर्पित करना है
यदि ईश्वर कृपा है,
तो गुरु उस कृपा का साकार रूप हैं।

यदि ईश्वर आराधना है,
तो गुरु उसका जीवंत अनुभव
इसलिए,
जब भी मैं ज्ञान के द्वार पर खड़ा होता हूँ
सबसे पहले स्मरण करता हूँ,
उस गुरु का-
जिसने मुझे स्वयं से मिलवाया।

गुरु सचमुच ईश्वर के समान हैं,
क्योंकि वे मनुष्य को,
मनुष्य से श्रेष्ठ बनने की,
राह दिखाते हैं॥