कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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नारी तेरी अनेक कथा,
रूप एक, पर कार्य अनेक
सोच बदलकर काम है करती,
देश का सदा मान है रखती
आओ सबको एक बात बताऊँ,
‘नीरा आर्य’ आज़ाद हिंद में रहती थीं
देश की पहली महिला जासूस थीं,
झाँसी रेजिमेंट की सिपाही थी।
उत्तर प्रदेश के बागपत में जन्म लिया,
शिक्षा पाई कोलकाता में
कई भाषा में प्रवीण थीं,
देश की खातिर सब सह गईं।
ब्रिटिश भारत में सीआईडी इंस्पेक्टर थ,
श्रीकांत जय रंजन दास नाम था
अंग्रेजों का भक्त था वो,
‘नेताजी’ के जासूस को मारना चाहता था।
देश की खातिर जुल्म सहती गईं
शरीर का हर दर्द अनदेखा करती गईं
नेताजी पर चली गोली,
सामने आ गईं नीरा आर्य।
मार दिया अपने पति को,
बचा लिया नेताजी को
वीर थीं, धीर थीं,
पकड़ लिया ब्रिटिश सिपाही ने।
काल कोठरी में बंद किया,
पानी-खाना भी न दिया
समुंदर बीच द्वीप जेल में कैद थीं,
अत्याचार पर अत्याचार किया।
आता लोहार, काटता साँकल,
हाथ की चमड़ी कट जाती
हथौड़ी चलती पैरों पर,
हड्डी-हड्डी चूर हो जाती।
बोलीं-अंधे हो क्या, ऐसे मारते हो ?
बोला अत्याचारी-दिल में भी मार देंगे
तुझे हरा दिया है अब तो,
क्या कर लोगी कैदी मेरी ?
बंधन में थीं, फिर भी हिम्मत रग-रग में थी,
थूक दिया उसके ऊपर
गरज कर बोलीं वीरांगना-
औरत की इज्जत करना सीख।
मुँह न खोला, राज न बताया
अड़ी रही अटल होकर
बस इतना बोलीं-
मेरे दिल में जिंदा हैं ‘नेताजी’।
सुनकर जेलर चिल्लाया,
लोहार को हुक्म दिया
काट दो इसका दिल,
दायाँ स्तन काट दिया गया।
प्रथम जासूस थीं नीरा आर्य,
खून से लथपथ रहीं
जेल से छूटकर भी सहायता न ली,
मंदिर के सामने फूल बेचकर जीवन काटा।
एक दिन मौत को भी गले लगा लिया,
आओ देश के लोगों।
तुम कुछ काम महान करो,
नीरा आर्य को एक बार तो याद करो॥