आचार्य संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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तुम चंदन हो,
शिव के तृपुण्ड की शोभा हो
तो मैं उस भोले की भक्ति हूँ,
जिसमें तुम हर पल समाए हो।
तुम लकड़ी का चंदन हो,
मस्तक का सुंदर मुकुट हो
तो मैं उस माथे की आस्था हूँ,
जिस पर तुम्हारा पावन तिलक हो।
तुम चंदन हो,
रघुनंदन के मस्तक का तिलक हो
तो मैं मर्यादा पुरुषोत्तम की,
मर्यादा का अनुकरण हूँ।
तुम पूजा का वंदन हो,
जन-जन का अभिनंदन हो
तो मैं उन झुके हुए मस्तकों की,
निष्कलंक श्रद्धा हूँ।
तुम चंदन हो,
सर्पों के स्नेह का स्पंदन हो
तो मैं उस विषधर के भीतर छिपी,
शिवत्व की पहचान हूँ।
तुम शीतल चंद्रमा को अपने भीतर लिए हो,
तुलसी के हाथों घिसे हो
माधव के ललाट पर सजे हो—
तो मैं उस तुलसी की भक्ति हूँ,
जो तुम्हें घिसकर भी
तुम्हारी सुगंध बढ़ाती है।
तुम यज्ञ की आहुति हो,
हवन की पवित्रता हो
पूजन की शुद्धता हो,
तो मैं उन मंत्रों का स्वर हूँ
जो तुम्हारे स्पर्श से,
और पावन हो जाते हैं।
तुम वन में खड़ा
पावन-पवित्र वृक्ष हो,
तो मैं उस धरती का प्रण हूँ
जो तुम्हारी जड़ों को,
अपनी साँसों से सींचती है।
तुम राम के ललाट पर शोभते हो,
कृष्ण के मस्तक पर मुस्काते हो
महादेव के तृपुण्ड में बसते हो—
तो मैं उन तीनों के चरणों में
समर्पित सनातन भाव हूँ।
तुम शव का श्रृंगार बनकर,
अंतिम यात्रा में भी साथ चलते हो
तो मैं उस सत्य का साक्षी हूँ,
कि—
जीवन की पहली पूजा से
मृत्यु की अंतिम यात्रा तक,
चंदन…
मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता।
तुम पर्यावरण का समर्पण हो,
प्रदूषण का दर्पण हो
अर्पण भी तुम,
तर्पण भी तुम—
तो मैं आने वाली पीढ़ियों के लिए,
धरती बचाने का संकल्प हूँ।
तुम शीतलता हो,
स्वच्छता हो
सुगंधित पवन का संदेश हो,
तो मैं उस प्रकृति की आवाज़ हूँ
जो कहती है—
वृक्ष बचाओ,
जीवन बचाओ
सुगंध बचाओ,
अपना कल बचाओ।
तुम दूल्हे के माथे का
पुण्य तिलक बनते हो,
तो मैं उस नवजीवन की
नई शुरूआत हूँ।
तुमने अग्निकुंड झेला है,
तपकर भी सुगंध दी है
तो मैं तुम्हारे जीवन से निकला,
वह संदेश हूँ कि—
जो स्वयं तपता है,
वही दूसरों को शीतलता देता है।
तुमने ज़िंदगी का मेला देखा,
जन्म से मृत्यु तक सफर किया
हर पड़ाव पर सुगंध बाँटी—
तो मैं तुम्हारे जीवन का
वह अर्थ हूँ,
जो समय से परे है।
तुम कहते हो—
“मैं चंदन हूँ…।”
हाँ, तुम चंदन हो,
पर केवल इसलिए नहीं
कि तुम्हारे भीतर सुगंध है—
तुम चंदन इसलिए हो,
क्योंकि स्वयं घिसकर भी
दूसरों के माथे को
शीतलता देते हो।
तुम चंदन हो,
मैं तुम्हारा सम्मान हूँ
तुम सुगंध हो,
मैं तुम्हारा गुणगान हूँ
तुम वृक्ष हो,
मैं तुम्हारी छाँव हूँ
तुम शब्द हो,
मैं तुम्हारा भाव हूँ।
और अंत में इतना ही—
चंदन होना आसान है,
पर चंदन-सा होना कठिन है
खुद जलकर भी सुगंध देना,
खुद मिटकर भी संसार सँवारना—
यही तो चंदन की पहचान है।
तुम चंदन हो…
और मैं कवि हूँ—
तुम्हें लिखता नहीं,
तुमसे सीखता हूँ
तुम्हारी सुगंध कहता नहीं,
तुम्हारी सुगंध में जीता हूँ।
तुम चंदन हो…,
तो मैं तुम्हारी कविता हूँ॥
परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे आचार्य संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएस-सी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता व रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुम्बई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़े हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। सम्मान-पुरस्कार में आपको महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२०२३ सहित अन्य मिले हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार करना है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज-पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”