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बंदूक और रेस्त्रां कारोबार:सरकारी मशीनरी की मानसिकता बदलनी चाहिए

अजय बोकिल
भोपाल(मध्यप्रदेश) 

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अपनी समृद्ध पाक कला और खवैयों के देश भारत में रेस्टारेंट या होटल खोलना,बंदूक खरीदने से कहीं ज्यादा कठिन है। मतलब ये कि,आप आत्मरक्षा के लिए बंदूक का लायसेंस अपेक्षाकृत आसानी से बनवा सकते हैं, लेकिन पेट-पूजा के लिए रेस्त्रां खोलना टेढ़ी खीर है,क्योंकि एक अदद रेस्टारेंट या होटल खोलने(सड़क किनारे मनमाने ढंग से खुले ढाबे या ठेलों को छोड़ दें) के लिए सरकारी प्रक्रिया और कागजी कार्रवाई इतनी ज्यादा है कि,इंसान होटल की जगह बंदूक का धंधा करना ज्यादा मुनासिब समझने लगे। यह स्वीकारोक्ति खुद मोदी सरकार की है,जो संसद में पिछले साल का आर्थिक सर्वेक्षण पेश करते हुए दी है। सरकार रेस्टारेंट उद्योग को ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के तहत लाना चाहती है। मकसद ये कि कम-से-कम खान-पान का धंधा तो कागजी कार्रवाई के बोझ से मु‍क्त हो। वैसे यह तथ्‍य बेहद रोचक और काफी हद तक सही भी है कि,सरकार बंदूक खरीदने बेचने वाले पर उतना शक नहीं करती,जितना कि होटल या चाट का ठेला लगाने वाले पर करती है।

अब सवाल यह ‍कि,सरकार ने रेस्त्रां खोलने को बंदूक के मुकाबिल मुश्किल क्यों माना ? इसका जवाब पाने के लिए दोनों की लायसेंस प्रक्रिया को समझना होगा। भारत में बंदूक का लायसेंस पाना कोई हँसी-खेल नहीं है,बल्कि दुनिया के जिन चु‍निंदा देशों में बंदूक का लायसेंस हासिल करना सबसे कठिन है,उनमें भारत भी है। बंदूक के लायसेंस की प्रक्रिया इच्छुक व्यक्ति के आवेदन से कलेक्टर,एसपी,थाने और वापस कलेक्टर तक आती है। आपको हथियार का लायसेंस क्यों चाहिए,इसका संतोषजनक कारण बताना होता है। एक बार मिला लायसेंस ३ साल के लिए होता है। अगर यह जानें कि,भारत में कितने बंदूक लायसेंस और लायसेंसी हथियार हैं,तो उपलब्ध आँकड़ों के मुताबिक देश में करीब ७.१० करोड़ बंदूकें(फायर आर्म्स)हैं। इनमें से लगभग १ करोड़ बंदूकें लायसेंसी हैं,बाकी अवैध हैं। अगर भारत की आबादी १३० करोड़ मानें तो हर सौ व्यक्तियों पर ५.३ बंदूकें हैं। लायसेंस के अलावा बंदूक रखने के नियम भी कड़े हैं और उल्लंघन पर कड़ी सजा भी है। अब रेस्टारेंट की बात,तो जिस देश में हर मुख्य सड़क के किनारे ढाबे हों,तकरीबन हर गली,चौराहे,बस अड्डों और स्टेशनों के आसपास खाने के ठेले हों,वहां अधिकृत तौर पर लायसेंस लेकर रेस्त्रां खोलना आसान नहीं है। बंदूक के मुकाबले इस काम के लिए बहुत ज्यादा पापड़ बेलने पड़ते हैं। बंदूक के लिए तो कलेक्टर और पुलिस की अनुमति पर्याप्त होती है,लेकिन रेस्टोरेंट लायसेंस के लिए १३ तरह की अनुमतियां(चीन और सिंगापुर में केवल ४)जरूरी हैं। सबसे पहले रेस्टारेंट को एफएसएसआईए के तहत पंजीकृत कराना जरूरी(खाद्य सुरक्षा लायसेंस)और सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसके बिना होटल खोलना कानूनन जुर्म है। इसके अलावा सम्बन्धित राज्य का खाद्य व्यापार लायसेंस,भोजनगृह लायसेंस,अग्नि सुरक्षा प्रमाण-पत्र,लिकर लायसेंस,लिफ्ट अनुमति,पर्यटन सम्मति,म्यूजिक लायसेंस,पर्यावरणीय मंजूरी,साइनेज लायसेंस,दुकान एवं स्थापना अधिनियम के तहत पंजीयन,नाप-तौल विभाग की मंजूरी और बीमा। चूंकि,रेस्टारेंट का सीधा रिश्ता स्वाद के साथ-साथ आपके स्वास्थ्य और सुरक्षा से भी है,इसलिए ये मंजूरियां गैर जरूरी नहीं लगतीं,पर ये सब आसानी से और जल्दी मिलने का भी कोई तरीका नहीं है। इनमें से ज्यादातर मंजूरियां मिलने में वैसा ही समय बर्बाद होता है,जितना किसी बड़े होटल में आर्डर देने के बाद उसे परोसने में लगता है।

अगर इन्हीं व्यवस्थाओं की तुलना अमेरिका से करें तो बंदूक लायसेंस मामले में वहां जितनी दरियादिली है,शायद ही कहीं हो। बंदूक वहां खिलौने की माफिक उपलब्ध है। बंदूक का लायसेंस पाने के लिए एक ही मुख्य शर्त है और वो है आपकी उम्र २१ साल से ऊपर होना। यही वजह है कि आज अमेरिका की ४६ फीसदी आबादी के पास लायसेंसी बंदूकें हैं। यानी तकरीबन हर दूसरे व्यक्ति के पास कोई न कोई हथियार है। इसी का नतीजा है कि,वहां आए-दिन सामूहिक हत्याकांड होते रहते हैं,लेकिन किसी सरकार में इतनी ताकत नहीं है कि,वह बंदूकों का राशनिंग कर दे। लोग बेवजह मरने को तैयार हैं,पर बंदूक का मोह छोड़ने को राजी नहीं हैं। इसका एक बड़ा कारण वहां का ताकतवर हथियार गुट भी है।

एक और सवाल कि,हमारी सरकार ने होटल रेस्टारेंट उद्योग की तुलना बंदूक उद्योग अथवा लायसेंस प्रक्रिया से क्यों की ? ऐसा करके वह किसकी खामियों और अदूरदर्शिता की ओर इशारा कर रही थी ?,क्योंकि जो भी नियम बनाए हैं,वो सरकार ने ही बनाए हैं। उन्हें बनाते समय व्यावहारिक दिक्कतों और उद्योग हितैषी सोच का ध्यान क्यों नहीं रखा गया ? इन सवालों का उत्तर रेस्टारेंट और होटल उद्योग के तेजी से हो रहे विस्तार में है। ‘इंडिया ब्रांड एंड इक्विटी फाउंडेशन’ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत में होटल उद्योग,जो १५२४ में २०१७ अरब का था,वो २०१८ में ३२०५ अरब रुपए यानी दोगुना होने की उम्मीद है। यह कारोबार हर साल औसतन ७ फीसदी की दर से बढ़ रहा है,और देश में कुल का लगभग ९ फीसदी रोजगार भी दे रहा है। इनके अलावा देश में बढ़ती देशी-विदेशी पर्यटकों की संख्या और घर से बाहर किसी रेस्त्रां या होटल में खाने या पैक खाना मंगवाने का बढ़ता चलन भी है। यह प्रवृत्ति युवा पीढ़ी में इतनी तेजी से बढ़ रही है कि इस सदी के उत्तरार्द्ध तक घर में खाना बनाना या बनते देखना भी शायद एक टूरिस्ट वेंचर बन जाए।

सरकार बंदूक और होटल की तुलना कर अगर यह संदेश देना चाहती है कि, उसकी मंशा पेट-पूजा और आतिथ्‍य से जुड़े कारोबार को आसान बनाना है तो यह खुशी की बात है,किन्तु व्यवहार में वैसा सब होता नहीं दिखता,जो सरकारी दावों में होता है। नीयत के साथ साथ सरकारी मशीनरी की मानसिकता भी बदलनी चाहिए। आज आलम यह है कि हर छोटा-बड़ा कारोबार सरकारी तंत्र की निगाह में चोर अथवा संदिग्ध है। यूँ भी लायसेंसिंग प्रक्रिया को अलग रखें तो बंदूक और रेस्त्रां का आपस में कोई मेल नहीं है। एक जान लेने के लिए है,तो दूसरा जान डालने के लिए है,और हमारी संस्कृति तो सदियों से जान डालने अथवा जान बख्‍शने वालों के हक में खड़ी दिखती आई है।

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