स्वतंत्रता का अर्थ है एक बेहतर भारत की ओर

अजय जैन ‘विकल्प’इंदौर (मध्यप्रदेश)************************************* स्वतंत्रता दिवस विशेष…. हर साल १५ अगस्त केवल तिरंगा फहराने, राष्ट्रगान गाने और स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने का दिन नहीं है। यह वह अवसर है, जब एक राष्ट्र अपने वर्तमान को देखता है-यानी कहाँ जाना है, अपनी कमियों पर विचार करता है-यानी क्या गलती हुई है, और भविष्य की दिशा … Read more

तिरंगा हर घर पहुँचे, ‘वंदे मातरम्’ हर हृदय में गूंजे

संदीप ‘सृजन’उज्जैन (मध्यप्रदेश)******************************************** स्वतंत्रता दिवस विशेष… राष्ट्रीय ध्वज किसी राष्ट्र की पहचान भर नहीं होता, वह उसकी सामूहिक चेतना, इतिहास और स्वाभिमान का प्रतीक होता है। भारत का तिरंगा भी हमारे लिए केवल ३ रंगों और अशोक चक्र से निर्मित ध्वज नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के संघर्ष, असंख्य बलिदानों और एक बेहतर राष्ट्र के सपने का … Read more

मानवता के सामने सबसे बड़ा खतरा ?

डॉ. शैलेश शुक्लालखनऊ (उत्तरप्रदेश)************************************ कुछ वर्ष पहले तक दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा परमाणु बम को माना जाता था। आज भी यदि किसी देश के पास परमाणु हथियार हैं, तो दुनिया चिंतित हो जाती है लेकिन अब एक नई शक्ति तेजी से विकसित हो रही है, जिसका नाम है कृत्रिम मेधा (एआई)। यह तकनीक … Read more

जनता को सुनना होगा लोकतंत्र में

ललित गर्गदिल्ली******************************* जंतर-मंतर से उठी हाल की युवा आवाजों ने भारतीय लोकतंत्र के सामने कई नए प्रश्न खड़े किए हैं। आंदोलन को लेकर समाज में २ मत हो सकते हैं, आंदोलन की शैली, नेतृत्व और उसके राजनीतिक इस्तेमाल पर भी बहस हो सकती है, लेकिन एक बुनियादी सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि … Read more

स्वयं बदलें और भारत को शिखर तक पहुँचाएँ

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) ************************************************* भारतीय संस्कृति में सावन केवल वर्षा ऋतु का एक महीना नहीं, बल्कि प्रकृति, अध्यात्म, प्रेम, लोकजीवन, त्याग और नवसृजन का उत्सव है। सावन आते ही धरती हरित वस्त्र धारण करती है, आकाश मेघों से भर जाता है और रिमझिम वर्षा जीवन में नई उमंग भर देती है। इसी सावन … Read more

परहित सरस धर्म नहीं भाई…

राधा गोयलनई दिल्ली************************************** किसी ने कहा है-इंसान बनो, कर लो भलाई का कोई काम दुनिया से चले जाओगे, रह जाएगा बस नाम।    लाखों लोग यहाँ शान अपनी दिखाते हुए आए थे। सोचा था कि दुनिया को अपनी मुट्ठी में कैद कर लेंगे, सब पर अपनी धाक जमा लेंगे, दुनिया की सारी दौलत हमारी है… लेकिन हुआ … Read more

जातिगत आरक्षण से आगे आवश्यकता आधारित न्याय का समय

डॉ. शैलेश शुक्लालखनऊ (उत्तरप्रदेश)************************************* भारत का संविधान समानता, सामाजिक न्याय और अवसरों की समान उपलब्धता के सिद्धांत पर आधारित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश के निर्माताओं ने यह स्वीकार किया, कि सदियों से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता का सामना करने वाले समुदायों को मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान आवश्यक हैं। इसी … Read more

‘गलती’ पीठ की तरह

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’सोलन (हिमाचल प्रदेश)******************************************* सतरंगी दुनिया -३५… अच्छे जरूर बनें, परन्तु जरूरत से ज्यादा नहीं। अगर ज्यादा अच्छे बनेंगे तो नीम्बू की तरह निचोड़ दिए जाओगे। याद रखिए, जहां से छल शुरू होता है, वहां से महाभारत शुरू होती है। जो चीज मन की शांति को छीन ले-उसे छोड़ देना ही समझदारी है; … Read more

संसद को ठप कर देना उचित नहीं

ललित गर्गदिल्ली*******************************     भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संसद है। यही वह सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है जहां राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य से जुड़े विषयों पर गंभीर विमर्श होता है, सरकार जवाबदेह बनती है, विपक्ष जनभावनाओं को स्वर देता है और कानूनों के माध्यम से देश के विकास की दिशा तय होती है, … Read more

पीओके की पुकार और दुनिया की जिम्मेदारी

ललित गर्गदिल्ली******************************* पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में इन दिनों जो परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, वे केवल एक चुनावी प्रक्रिया की कहानी नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र, मानवाधिकार और जनविश्वास के गहरे संकट की दास्तान हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक शक्ति निष्पक्ष चुनाव, नागरिक स्वतंत्रता और शासन की जवाबदेही में निहित होती है, लेकिन … Read more