वनों को संसाधन नहीं, जीवन का अभिन्न अंग मानें

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** ‘अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस’ (२१ मार्च) विशेष… २१ मार्च को प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला ‘अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस’ केवल एक प्रतीकात्मक उत्सव नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती की ओर संकेत करने वाला अवसर है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष २०१२ में इसकी घोषणा इस उद्देश्य से की गई थी कि … Read more

मन से डर निकाला जाए

पद्मा अग्रवालबैंगलोर (कर्नाटक)************************************ हमारे भारतवर्ष में पुरातनकाल से धन की देवी लक्ष्मी, शक्ति की देवी दुर्गा तो विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-आराधना की जाती रही है।‘यत्र नार्यंतु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः’ यानी जहाँ स्त्री का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है।आज नारी निर्बल नहीं है, वरन् उसका सबल पक्ष देखने को … Read more

चुनाव : जंग में लोकतांत्रिक मूल्य फिर दाँव पर

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं होते, बल्कि लोकतंत्र की परिपक्वता, जनविश्वास और राजनीतिक संस्कृति की परीक्षा भी होते हैं। जब किसी राज्य या क्षेत्र में चुनाव की घोषणा होती है, तो स्वाभाविक रूप से राजनीतिक गतिविधियाँ तेज हो जाती हैं। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता … Read more

सरकारी प्राथमिक शिक्षा प्रणाली में सुधार की महती आवश्यकता

पूनम चतुर्वेदी शुक्लालखनऊ (उत्तरप्रदेश)************************************** भारत की शिक्षा व्यवस्था की सबसे मजबूत और सबसे संवेदनशील कड़ी प्राथमिक शिक्षा है। यहीं से किसी भी बच्चे के बौद्धिक, सामाजिक और नैतिक विकास की नींव रखी जाती है। यदि यह आधार मजबूत हो, तो आगे की शिक्षा और जीवन की चुनौतियाँ अपेक्षाकृत सरल हो जाती हैं; यदि यह आधार … Read more

कृत्रिम बुद्धिमत्ता:नियमन की दौड़ और भारत की स्थिति

डॉ. शैलेश शुक्लाबेल्लारी (कर्नाटक)**************************************** इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक के मध्य तक आते-आते ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ केवल एक तकनीकी नवाचार भर नहीं रह गई है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, कूटनीति और सामाजिक संरचना को पुनर्परिभाषित करने वाली निर्णायक शक्ति बन चुकी है। २०२६ का वर्ष इस परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है, … Read more

धर्म और पर्यावरण संरक्षण

पूनम चतुर्वेदी शुक्लालखनऊ (उत्तरप्रदेश)************************************** पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता जिन २ स्तंभों पर टिकी है, उनमें से एक है – मनुष्य की आस्था और दूसरा है प्रकृति का संतुलन। जब तक ये दोनों एक-दूसरे के पूरक रहे, तब तक मानव सभ्यता फलती-फूलती रही, किंतु जैसे-जैसे आधुनिकता के नाम पर मनुष्य ने प्रकृति को उपभोग की … Read more

आभासी दुनिया से बचपन को सुरक्षित रखने की पहल जरूरी

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** डिजिटल युग में मानव जीवन की गति और स्वरूप तेजी से बदल रहा है। संचार, शिक्षा, मनोरंजन और सामाजिक संबंधों का बड़ा हिस्सा अब आभासी माध्यमों के सहारे संचालित होने लगा है। इस परिवर्तन ने जहां अनेक सुविधाएं प्रदान की हैं, वहीं विशेष रूप से बच्चों और किशोरों के मानसिक, शैक्षणिक, सामाजिक … Read more

स्त्रियों की भूमिका पर पुनः शोध की आवश्यकता

सरोजिनी चौधरीजबलपुर (मध्यप्रदेश)********************************** नारी:संघर्ष, शक्ति, समाज और सफलता…. आज से नहीं, बल्कि वर्षों से महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती आ रही हैं। महिला होती तो शक्तिशाली है, पर वह अपनी शक्ति को पहचानती नहीं और समाज उसका नाजायज फ़ायदा उठाता है; पर अब निरंतर स्थिति कुछ हद तक सुधरती जा रही है। महिलाएँ … Read more

नारी शक्ति का नया युग और चुनौतियाँ

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** नारी:संघर्ष, शक्ति, समाज और सफलता…. मानव सभ्यता के विकास की कथा में यदि किसी शक्ति ने सबसे अधिक सृजन किया है, तो वह नारी शक्ति है। वह जीवन की जननी है, संस्कृति की वाहक है और समाज की संवेदनशील आत्मा है। भारतीय परम्परा ने नारी को केवल एक सामाजिक भूमिका तक सीमित … Read more

आग का दरिया:क्या होगा भविष्य

डॉ. शैलेश शुक्लाबेल्लारी (कर्नाटक)**************************************** २८ फरवरी २०२६ की वह रात मध्य-पूर्व के इतिहास में एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज होगी, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ शायद ही भुला सकें। ठीक रात २ बजकर ३० मिनट पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक ८ मिनट का वीडियो बयान … Read more