मुफ्तखोरी रोग

संजय वर्मा ‘दृष्टि’ मनावर(मध्यप्रदेश)**************************************** मुफ्तखोरी इंसान को,कर देती लाचारमुफ्तखोरी का माल खा कर,नहीं सुधरते उसके आचार। ‘मेहनत’ शब्द को आलसी इंसान,राष्ट्र के विकास को ले जाता गर्त मेंराहें नहीं सूझती विकास की,मुफ्तखोरी के चक्कर में हो जाता दृष्टिहीन। राष्ट्र के विकास के गिर जाते तम्बू,मेहनतकश इंसान भीमुपतखोरी के चक्कर में,हो जाते पंगु॥  परिचय-संजय वर्मा का साहित्यिक … Read more

मति विवेक वश मन करो

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) ************************************************* आशा मन अतिरेक बन, चाहत बिना प्रयास।करे याचना पद विभव, दीन-हीन आभास॥ मन सुन्दर जग चारुतम, अम्बर मुक्त उड़ान।सत्य न्याय पथ त्याग बल, संजीवन वरदान॥ रखो मनोबल धैर्य को, रहो संयमित ध्येय।साहस रख विश्वास ख़ुद,रिद्धि सिद्धि यश गेय॥ निन्दक नित प्रेरक पथी, मन का कर अवरोध।चल पौरुष पथ सच … Read more

ये जीवन का लक्ष्य…

सौ. निशा बुधे झा ‘निशामन’जयपुर (राजस्थान)*********************************************** लक्ष्य जो तुमने साधा, यह जीवन सज गया,उम्र गुजर जाएगी, और हाथ में न यह जवानी होगीहोगी आस, जो लक्ष्य तुमने साधा,लोगों की चर्चा होगी, जुबान पर एक नई कहानी होगी। संघर्ष तुम्हारा होगा, याद बस यह सच होगा,जीवन कठिनाइयों को दूर कर आगे बढ़ेगारास्तों पर हर एक नया … Read more

चार दिन की ज़िंदगी

हरिहर सिंह चौहानइन्दौर (मध्यप्रदेश )************************************ जीवन क्या है रास्तों पर भटकता राही,यहाँ सराय में ठहरा मुसाफिरचार दिन की जिंदगी,चार कंधों पर यूँ ही चले जाना है। कोई कभी भी किसी के लिए नहीं रुका,यह बहता हुआ पानी अविरल बहता रहता हैसुख-दु:ख उतार-चढ़ाव सहता रहता है,पर सब भूल जाता है कि चार दिन की जिंदगी है। … Read more

‘मैं’, मैं नहीं…

डॉ. मुकेश ‘असीमित’गंगापुर सिटी (राजस्थान)******************************************** ‘मैं’, मैं नहीं,मैं मेरा अहम्,क्या यह शरीर हूँ मैं ?कदापि नहीं-एक ओढ़ा हुआ वहम शायद। यह काया,माँसपेशियों का जालना मेरा आधार,ना मेरी पहचान का उपहार। बस कंचन-सा छलावा,जिसमें आत्मा-बाँसुरी की तान-सा बजता कोई स्वर। रिश्तों की गहराई में,क्या कभी मिला कोई ठहराव ?हर धड़कन में,कहीं धुंध-सी गलतफहमी जलाए बैठी अलाव। … Read more

ढलती उम्र

प्रो.डॉ. शरद नारायण खरेमंडला(मध्यप्रदेश)******************************************* पहले तो सब सुख से बीता, रोग कभी भी पास न आया।आकर जाती नहीं बुढ़ाई, अब हर दिन दु:ख पाती काया॥ बचपन में सब खुशहाली थी, दर्द नहीं कोई ग्रस पाया,आलस्य, पीड़ा, मायूसी ने, कभी नहीं किंचित भटकाया।मैंने गति में रहकर नित ही, अपना यौवन काल बिताया,उल्लासित रहकर सुख पाया, मन … Read more

मुफ़्तखोरी का चस्का ‘दमा’

हेमराज ठाकुरमंडी (हिमाचल प्रदेश)***************************************** मुफ़्तखोरी और राष्ट्र का विकास… सब्सिडी के झांसों में, होता भारत का इंसान निकम्मा है,मुफ़्तखोरी का चस्का, हुआ अब भारत को जैसे दमा है। विकास भारत का धीमा है, करते सब ऐसी ही बातें हैं,अब तो पचहत्तर का हो गया, फिर भी क्यों मुश्किलातें हैं ? मुफ़्तखोरी के आदी बाशिंदे, राष्ट्र … Read more

चारदीवारी में बेबस

डॉ. संजीदा खानम ‘शाहीन’जोधपुर (राजस्थान)************************************** चारदीवारी कैद, पिंजरा या मर्यादित जीवन है ?सुरक्षा की गारंटी है या कि सामाजिक बंधन है ? कैद पंछी उन्मुक्त गगन में उड़ना भूल जाते हैं,साँसें गिनते रहते हैं खाना-पीना भूल जाते हैं। सोने के पिंजरे में भी कैद नहीं भाती,आजादी जीवो में जीवन की चाहत लाती। तन्हाई, जुदाई, कैद … Read more

सादगी रूप विमल

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) ************************************************* सौम्य मनुज का सदा आभरण, चरित सादगी रूप विमल है।परिवर्तन सुस्वाद प्रकृति नित, देव असुर नर भूप प्रबल है। नीलांचल अरुणाभ सुभग नित, स्वच्छ सत्य आचार मनुज है।नवांकुरित नित बाल पल्लवित नवजीवन आधार सहज है। नील वर्ण नित विमल सादगी, प्रगति सतत निर्माण सुपथ है।नीलकमल नीलाभरण चरित, जन प्रतीक … Read more

क्या खोया, क्या पाया…

सरोजिनी चौधरीजबलपुर (मध्यप्रदेश)********************************** अखण्ड ब्रह्माण्ड में विद्यमान,कलाकार वह बड़ा ऊर्जावानअनेक नाम हैं उसकी पहचान,अनुभव में है वह श्रद्धावान। जो विगत में की नेक कामना,उससे मिले सम्मान, न हो भावनासम्मान बड़ों का, यह हो साधना,छोटों को बस सदा प्यार बाँटना। इस वर्ष रहा प्रभु का वरदान,दे सकी साहित्य में योगदानछवि बन रही है अब पहचान,मेरे सपनों … Read more