कैद जिंदगी
विजयलक्ष्मी विभा इलाहाबाद(उत्तरप्रदेश)********************************************************* हाय तपस बढ़ती जाती है,भाग रहा मन हमें छोड़कर बंद कक्ष में कैद जिंदगी, जाये,बंधन कहां तोड़कर।`कोरोना` यमदूत चतुर्दिक, खड़ा भुजाएं निज फैलायेएक-एक को निगल रहा है, मानव विकल कहां छिप जायेl जर्जर तन के भीतर कैसे, रक्खे साँसें जवां जोड़कर। यह विशाल दुनिया है कैसी, है विषाणुओं से भी छोटी इसमें हर … Read more