पर्यावरण का नुकसान

हेमराज ठाकुरमंडी (हिमाचल प्रदेश)***************************************** मेरी रूह रोती है कांप-कांप कर,देख के पर्यावरण का नुकसानचिन्ता लगी है मन में इक भरी कि,हो न जाए कहीं यह धरती श्मशान। दया आती है तेरी करनी पर,तू कर क्या रहा है ओ इंसान ?सृष्टि रचाने वाले से डर जरा,तू क्यों बना है खुद भगवान… ? नदियाँ नाला हो रही … Read more

ससुराल के बीते दिन

प्रो.डॉ. शरद नारायण खरेमंडला(मध्यप्रदेश)******************************************* स्वर्णिम युग ससुराल का, याद करे दामाद।पर अब कुछ भी है नहीं, केवल है अवसाद॥ ख़ातिरदारी है नहीं, अब सूना मैदान।बिलख रहे दामाद जी, रुतबे का अवसान॥ स्वर्णिम युग पहले रहा, खाते थे पकवान।अब तो सारे मिटे गए, ससुराली अरमान॥ कितना प्यारी थी कभी, जिनको तो ससुराल।उनको दुख अब सालता, अब … Read more

बढ़ते रहिए जीवन में

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) ************************************************* बढ़ते रहिए, जीवन में कुछ न कुछ करते रहिए,हिन्दी-हिन्दुस्तान प्रगति पथ गढ़ते रहिएपरमार्थ निकेतन लक्ष्य कर्मपथ संघर्षों,यायावर हमसफ़र राष्ट्र पथ बढ़ते रहिए। अरमानों उत्तुंग शिखर नित चढ़ते रहिए,राष्ट्रधर्म श्रीवर्धन रथ रण नित बढ़ते रहिएतनिक वक्त हो आत्मचिन्तना निज कृतकर्मों,स्वाभिमान निर्माण राष्ट्र नव गढ़ते रहिए। कहाँ नहीं बाधित जीवन श्रम … Read more

दौड़ती थी सरपट

संजीव एस. आहिरेनाशिक (महाराष्ट्र)********************************************* साईकिल दिन की संध्या पर मुझे याद आ रही है मेरी वो साईकिल,जिसके प्यार में मैं सालों तक रहा डूबा,और कहीं नहीं लगता था दिलअगर माँ के बाद कुछ प्यारा था, तो वह केवल मेरी प्यारी साईकिल थीउन दिनों हम सब बच्चों की साईकिलें चलाते-चलाते लगती महफ़िलें थी। तीन चरणों में … Read more

कुसुमलता

सरोजिनी चौधरीजबलपुर (मध्यप्रदेश)********************************** ‘कुसुमलता’ नाम था उसका,पूरी सोसायटी में कोई ऐसा नहीं था, जिसे उसका नाम न पता हो।वो थी ही ऐसी, साफ-सुथरे कपड़े पहनती, सबका यथायोग्य आदर करती, सब उससे बहुत खुश रहते।बस उसकी एक आदत सबको बहुत परेशान करती है, वह यह कि वो अपने पास मोबाइल नहीं रखती। इससे सभी को कठिनाई … Read more

कश्ती कागज की

डॉ. संजीदा खानम ‘शाहीन’जोधपुर (राजस्थान)************************************** अधजल गगरी छलकत जाय प्रणय,मिलन की आस में जीवन की रवानी। कागज की कश्ती बारिश का पानी,वो यादें बचपन की सुहानी। सुनाती जब नानी और दादी कहानी,आ जाती फिर निंदिया सुहानी। मौज-मस्ती के हिचकोले रंगीन यादें,वो नाव कागज की पानी में चलानी। सुंदरता बचपन की गुदगुदाती बातें,उछल-कूद के संग भीगे … Read more

मन घबरा रहा…

हरिहर सिंह चौहानइन्दौर (मध्यप्रदेश )************************************ विश्व पर्यावरण दिवस (५ जून) विशेष…. जल रही धरती,ज़लज़ला आ रहाप्रकृति का यह तांडव,मन घबरा रहा। साँस लेने के लिए जरूरी हवा,वह भी दूषित व जहरीली हो चुकीबचाओ इस धरती माँ को,मन घबरा रहा। हरित क्रांति व ग्रीन हाउस को, सपने मत बनाओपेड़ लगाओ, आओ आगे आओ प्रकृति बचाओ,ईंट पत्थरों … Read more

पंछी की फरियाद

सीमा जैन ‘निसर्ग’खड़गपुर (प.बंगाल)********************************* पेड़ और पानी से भरपूर था,घरौंदा डालियों पर झूलता थासभी पक्षी मस्ती मचाते थे,पेड़ पर पींगे लगाते थे। जाने किस दुश्मन का साया,प्यारे जंगल पर छाया थाएक-एक कर धीरे से उसने,सब, पेड़ों को कटवाया था। हरियाली सारी खत्म हो गई,पेड़ों की संख्या न्यून हो गई।दाने जाने कहाँ खो गए ?पानी के … Read more

नशा’ बे-पल- बे-मौत बुलावा

सरोज प्रजापति ‘सरोज’मंडी (हिमाचल प्रदेश)*********************************************** बात पते की हे जन ! जानो,नशा नशीला, मारक मानो हैबे-पल बे-मौत बुलावा,क्या है शान ? प्रतिपल छलावा। धीमा जहर, जीवन बुझाता,घनेरी यंत्रणा, अधम तृष्णाकैसी नियति दूभर, मजबूरी,क्रय-विक्रय है, लानत ‘दस्तूरी।’ शराब, भांग, सिगरेट, गांजा,तम्बाकू, गुटखा ‌है शिकंजा अय्याशी!,दूर-बुद्धि है लाता,नैतिक पतन, दूर-चरित्र होता। खास स्पर्धा, दिवस हैं मनाते,भाषण, नारे, … Read more

फिर हराओ ‘कोरोना’ को

संजय सिंह ‘चन्दन’धनबाद (झारखंड )******************************** मानव जीवन था नज़र बंद,पक्षी-पौधे थे पूर्ण स्वछंदपर्यावरण हुआ स्वच्छ मंद,नहरों-नदियों में अंतर्द्वंद। दृष्टिगत हुई नदियाँ गहरी,पक्षी स्वयं समझे उड़नपरीदुनिया इंद्रधनुषी रही खड़ी,खुशहाली कर्फ्यू की भेंट चढ़ी। कल-कल नदियाँ आगे को बढ़ी,लहरें समुद्र की हिलोरे ले चढ़ी,हरियाली प्रकृति ने खूब गढ़ी,जीव-जंतुओं की फ़िक्र बड़ी। महामारी ‘कोरोना’ थी बहुत बड़ी,बढ़े सैनेटाइजर … Read more