शब्द आते हैं…
डॉ. मुकेश ‘असीमित’गंगापुर सिटी (राजस्थान)******************************************** शब्द आते हैंधीरे-धीरे,जैसे किसी गहरे कुएँ सेरस्सी पर लटकते हुए,एक-एक कर निकलते हों। कभी धुँधलेकभी साफ़,कभी अधूरेतो कभी इतने तेज़,कि दिमाग़ की दीवारों से टकराकरख़ुद ही लौट जाते हैं। मैं उन्हें पकड़ता हूँसँवारता हूँ,कभी अपनी उँगलियों सेकभी एक बेचैन ख़्याल से,तो कभी बस यूँ हीउन्हें बहने देता हूँ,जैसे बारिश की … Read more