Visitors Views 15

कोरोना:हवा से बड़ा खतरा,सावधानी ही बचाव

प्रियंका सौरभ
हिसार(हरियाणा)

**********************************************************

आज भारत में ‘कोरोना’ के मरीज सबसे ज्यादा हो चुके हैं,जो बेहद चिंताजनक स्थिति है। हमारे लिए मृत्युदर कम होना ही एक संतोष की बात है,जिसकी वजह से हमने आज इससे डरना बंद कर दिया है मगर ये स्थिति इलाज के अभाव में कभी भी करवट ले सकती है। तेजी से फैलते कोरोना संक्रमण पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अभिकरण (एजेंसी) ने स्वीकार किया कि कोरोनो विषाणु के हवाई प्रसारण से खतरा हो सकता है। संगठन ने आख़िरकार यह स्वीकार किया कि,विषाणु संक्रमण के ‘हवा से फैलने’ के सबूत हैं। अभिकरण के वैज्ञानिकों ने कहा कि विशेष रूप से भीड़,बंद,खराब हवादार स्थिति में एयरबोर्न प्रसारण की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता है।
क्लीनिकल इंफ़ेक्शियस डिज़ीज़ जर्नल के एक खुले ख़त में ३२ देशों के २३९ वैज्ञानिकों ने इस बात के प्रमाण दिए है कि ये ‘फ़्लोटिंग वायरस’ है जो हवा में ठहर सकता है और साँस लेने पर लोगों को संक्रमित कर सकता है। यदि किसी संक्रमित मरीज को किसी भी बंद स्थान पर काफी समय तक रखा जाए तो उस स्थान में भी हवा में विषाणु मौजूद रहेगा और हवा के संपर्क में आने से कोई भी कोरोना संक्रमित हो सकता है। संगठन ने माना है कि संक्रमित व्यक्ति के छींकने और खाँसने से निकली छोटी बूंदें काफी देर तक तक हवा में रहती हैं और इससे दूसरों को संक्रमण का खतरा रहता है,इसलिए सबको हवा से हुए प्रसार से सतर्क रहने की जरूरत है।
विभिन्न अध्ययन तथा विश्लेषणों के हवाले से जितने भी सबूत निकले हैं उससे पता चलता है कि कोरोना का हवा से भी प्रसार संभव है। यह तो साफ है कि जब लोग छींकते हैं या खाँसते हैं तो उससे हवा में बूंदें निकलती हैं। बड़ी बूंदें गिर जाती हैं लेकिन छोटी हवा में काफी समय तैरती रहती हैं। ये छोटी बूंद एरोसोल की तरह होती है,जो हवा में निलंबित कण है। विषाणु के संचरण के संदर्भ में एरोसोल साँस की बूंदों की तुलना में छोटे (५ माइक्रोन या उससे कम) होते हैं। सामान्य अंदरूनी वायु वेगों पर एक ५ माइक्रोन छोटी बूंद १० मीटर की दूरी तय करती है,जो एक विशिष्ट कमरे के पैमाने से बहुत अधिक है। एक व्यक्ति जो कोरोना संक्रमित है,वह छोटे खराब हवादार कमरे में १-२ मीटर की दूरी पर भी खड़े लोगों को संक्रमित करने की संभावना रखता है। इसलिए तो कोविद-१९ संक्रमण फैलाने वाली साँस की बूंदों ने महामारी की शुरुआत से हमें मुख पट्टी पहनना,दूरी रखना और हाथ धोने की दिनचर्या अपनाने को मजबूर किया है।
एक छोटी बूंद और एरोसोल के बीच अंतर का अनुमान लगाया जा सकता है। एक बीमार व्यक्ति के मुँह या नाक से आने वाली बूंदें भारी होती हैं,और ६ फुट से अधिक आगे बढ़ने से पहले जमीन पर गिर सकती हैं। तभी तो हम कोरोना से बचने के लिए एक दूसरे के बीच डेढ़ मीटर से अधिक दूरी बनाए रखने के लिए जोर दे रहे हैं। एरोसोल,जो बहुत छोटे होते हैं,गिरने से पहले लंबे समय तक लम्बी यात्रा कर सकते हैं। एरोसोल की कल्पना कुछ हद तक एक शराबी की तरह हो सकती है,जो रात में खराब रोशनी वाली सड़क पर चलता जाता है,जब तक उसको उस रस्ते से दूर नहीं किया जाता। यह एक दीवार,फर्नीचर या शरीर हो सकता है जो इस प्रकार सफलतापूर्वक लोगों को संक्रमित कर सकता है।
एक हालिया अध्ययन में यह पाया गया कि सबसे संक्रमित क्षेत्र रोगी क्षेत्र में १ मीटर वर्ग वाला मोबाइल शौचालय था। ये भी पाया गया है कि जोखिम वातानुकूलित कमरों में सबसे अधिक है,विशेष रूप से केबिन या पिंजरे जैसे कमरे में। दूसरी ओर विशाल हवादार कमरे,संचरण का कम जोखिम वहन करते हैं। इसका मतलब यह है कि,बाहरी खुला सब्जी बाजार किसी सुपर बाजार से अधिक सुरक्षित है। अगर आप घर के अंदर हैं,तो अधिकतम वेंटिलेशन सुनिश्चित करने के लिए खिड़कियां खोलें। विषाणु का हवाई संचरण संभावित रूप से चिंता का विषय है।
यह इस संभावना को भी बढ़ाता है कि विषाणु हवा की धाराओं पर यात्रा कर सकता है,और यहां तक कि वातानुकूलित संघनन के माध्यम से प्रेषित किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि सामाजिक दूरी हमेशा प्रभावी नहीं हो सकती है और कोरोना विषाणु विशेष रूप से कम वेंटिलेशन के साथ भीड़ वाले अंदरूनी क्षेत्रों में एक बड़ा खतरा हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन इस मामले में फिलहाल दुनियाभर के अलग-अलग देशों के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर इस पर और ज्यादा काम कर रहा है।
खैर,कुछ भी हो,अभी तक कोरोना के पैदा होने,फैलने और खत्म होने के बारे सही जानकारी नहीं मिल पाई है,इसलिए सावधानी ही बचाव है।