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स्त्री हूँ मैं

वाणी वर्मा कर्ण
मोरंग(बिराट नगर)
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हाँ स्त्री हूँ मैं,
जगत जननी शक्ति स्वरूपा
लज्जा रूप क्षमा रूप,
जगदंबा
अबला नहीं सबला हूँ मैं,
हाँ स्त्री हूँ मैं…।

पर हाय रे विडंबना,
समर्पित फिर भी
पल-पल त्रसित-ग्रसित,
और तिरस्कृत
होती हूँ मैं,
हाँ स्त्री हूँ मैं…।

कहीं भ्रूण हत्या,
कही बलात्कृत
तो कही जिंदा जलाई,
जाती हूँ मैं
हाँ स्त्री हूँ मैं…।

घर मे ही बेघर,
हिंसा अत्याचार की शिकार
आँचल में ममता फिर भी,
आँखों में आँसू धार
रखती हूँ मैं,
हाँ स्त्री हूँ मैं…।

भूल गई अपना ही स्वरूप,
अपनी शक्ति अपना रूप
हो शिक्षित ना हो आश्रित,
बदलेगा युग मिटेगा क्रान्त
ना हो आक्रांत,
पूरी होगी इच्छा
जो मिल-जुल करे,
अपनी रक्षा।
विकास की ओर अग्रसर
होती हूँ मैं,
हाँ स्त्री हूँ मैं…॥