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अंधेरों का दर्द

अरशद रसूल,
बदायूं (उत्तरप्रदेश)
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रूबरू जब कोई हुआ ही नहीं,
ताक़े दिल पर दिया जला ही नहीं।

ज़ुल्मतें यूं न मिट सकीं अब तक,
कोई बस्ती में घर जला ही नहीं।

बेजमीरों के अज़्म पुख़्ता हैं,
ज़र्फ़दारों में हौंसला ही नहीं।

नक़्श चेहरे के पढ़ लिये उसने,
दिल की तहरीर को पढ़ा ही नहीं।

उम्र भर वह रहा तसव्वुर में,
दिल की ज़ीनत मगर बना ही नहीं।

हमने अश्कों पर कर लिया क़ाबू,
ग़म का तूफ़ान जब रुका ही नहीं।

वह अंधेरों का दर्द क्या जाने ?
जिसका ज़ुल्मत से वास्ता ही नहीं॥

परिचय-अरशद रसूल का वर्तमान और स्थाई बसेरा जिला बदायूं (उ.प्र.)में है। ८ जुलाई १९८१ को जिला बदायूं के बादुल्लागंज में जन्मे अरशद रसूल को हिन्दी,उर्दू,अंग्रेजी, संस्कृत एवं अरबी भाषा का ज्ञान है। एमए, बीएड,एमबीए सहित ग्रामीण विकास में स्नातकोत्तर डिप्लोमा,मुअल्लिम उर्दू एवं पत्रकारिता में भी आपने डिप्लोमा हासिल किया है। इनका कार्यक्षेत्र-संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अंतर्गत ईविन परियोजना में (जिला प्रबंधक) है। सामाजिक गतिविधि में आप संकल्प युवा विकास संस्थान के अध्यक्ष पद पर रहते हुए समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों के खिलाफ मुहिम, ‘कथित’, संकुचित धार्मिक विचारधारा से ऊपर उठकर देश और सामाजिकता को महत्व देने में सक्रिय होकर रचनाओं व विभिन्न कार्यक्रमों से ऐसी विचारधारा के लोगों को प्रोत्साहित करते हैं, साथ ही स्वरोजगार,जागरूकता, समाज के स्वावलंबन की दिशा में विभिन्न प्रशिक्षण-कार्यक्रमों का आयोजन भी करते हैं। आपकी लेखन विधा-लघुकथा, समसामयिक लेख एवं ग़ज़ल सहित बाल कविताएं हैं। प्रकाशन के तौर पर आपके नाम -शकील बदायूंनी (शख्सियत और फन),सोजे वतन (देशभक्ति रचना संग्रह),प्रकाशकाधीन संकलन-कसौटी (लघुकथा),आजकल (समसामयिक लेख),गुलदान (काव्य), फुलवाऱी(बाल कविताएं)हैं। कई पत्र-पत्रिका के अलावा विभिन्न अंतरजाल माध्यमों पर भी आपकी रचनाओं का प्रकाशन जारी है। खेल मंत्रालय(भारत सरकार)तथा अन्य संस्थाओं की ओर से युवा लेखक सम्मान,उत्कृष्ट जिला युवा पुरस्कार,पर्यावरण मित्र सम्मान,समाज शिरोमणि सम्मान तथा कलम मित्र सम्मान आदि पाने वाले अरशद रसूल ब्लॉग पर भी लिखते हैं। इनकी विशेष उपलब्धि-बहुधा आकाशवाणी से वार्ताओं-रचनाओं का प्रसारण है। लेखनी का उद्देश्य-रचनाओं के माध्यम से समाज के समक्ष तीसरी आँख के रूप में कार्य करना एवं कुरीतियों और ऊंच-नीच को मिटाना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-कबीर,मुशी प्रेमचंद, शकील बदायूंनी एवं डॉ. वसीम बरेलवी तो प्रेरणापुंज-खालिद नदीम बदायूंनी,डॉ. इसहाक तबीब,नदीम फर्रुख और राशिद राही हैं। आपकी विशेषज्ञता-सरल और सहज यानी जनसामान्य की भाषा,लेखनी का दायरा आम आदमी की जिन्दगी के बेहद करीब रहते हुए सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करता है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“भारत एक उपवन के समान देश है,जिसमें विभिन्न भाषा, मत,धर्म के नागरिक रहते हैं। समता,धर्म और विचारधारा की आजादी इस देश की विशेषता है। हिन्दी आमजन की भाषा है, इसलिए यह विचारों-भावनाओं की अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट माध्यम है। इसके बावजूद आजादी के ६० साल बाद भी हिन्दी को यथोचित स्थान नहीं मिल सका है। इसके लिए समाज का बुद्धिजीवी वर्ग और सरकारें समान रूप से जिम्मेदार हैं। हिन्दी के उत्थान की सार्थकता तभी सिद्ध होगी,जब भारत में हिन्दी ऐसे स्थान पर पहुंच जाए,कि हिन्दी दिवस मनाने की जरूरत नहीं रहे।”