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`दोहन` नहीं,प्रकृति का पालन-पोषण आवश्यक

डॉ.पूर्णिमा मंडलोई
इंदौर(मध्यप्रदेश)

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प्रकृति और मानव स्पर्धा विशेष……..

मनुष्य सदियों से प्रकृति की गोद में पलता रहा हैl मानव और प्रकृति के बीच बहुत गहरा संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक ही नहीं,बल्कि एक-दूसरे पर निर्भर है। वास्तव में तो मनुष्य प्रकृति का ही अंग है। प्रकृति हमें जो देती है,वह अमूल्य है उसे खरीदा नहीं जा सकता। इसका मूल्य हम समझ नहीं पा रहे हैं। मनुष्य प्रकृति के उपहार का दुरुपयोग कर रहा है। हम अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति का अत्यधिक दोहन करते जा रहे हैं। हम इतने स्वार्थी हो गए हैं कि,आने वाली पीढ़ी की चिंता भी नहीं कर रहे हैं।
पिछले कई वर्षों में लगातार बारिश का कम होना,भू-जल स्तर में कमी होना,तापमान में वृद्धि होना,जंतुओं की कमी,खनिज संसाधनों की कमी,जंगलों का नष्ट होना और जैव विविधता में कमी ये सभी प्रकृति के अत्यधिक दोहन व शोषण के ही परिणाम हैं।
प्रकृति किसी के साथ भेदभाव या पक्षपात नहीं करती। अपना प्यार और उपहार सबको समान रूप से न्योछावर करती है,लेकिन जब हम अनावश्यक रूप से प्रकृति का दोहन करते हैं,खिलवाड़ करते हैं,उपहारों का दुरुपयोग करते हैं तो प्रकृति का गुस्सा भूकम्प,बाढ़,सूखा,सैलाब, भूस्खलन,असंतुलन और विश्व तपन जैसी कई आपदाओं के रूप में हमारे सामने आता है। प्रकृति के गुस्से को सहन करने की शक्ति मानव में नहीं है। वह यह भूल गया है कि जब प्रकृति रौद्र रूप दिखाती है तो सब-कुछ नष्ट हो जाता है।
अतः,इन परिणामों को देखते हुए अब हमें सचेत हो जाना चाहिए। अब हमें पर्यावरण का दोहन नहीं,उसका पोषण करने की आवश्यकता है। अब समय आ गया है कि हम सबको प्रकृति को एक पीढ़ी तक संभाल कर रखना होगा। जिस तरह सदियों से प्रकृति मानव का पालन-पोषण करती रही है,उसी तरह मानव का दायित्व है कि प्रकृति का पालन-पोषण करे। जिस तरह माता-पिता अपने बच्चे को बिना किसी अपेक्षा के उसका पालन-पोषण कर उसे बड़ा करते हैं,उसको कोई कष्ट ना हो,इसका ध्यान रखते हैं,विपरीत परिस्थितियों से रक्षा करते हैं। लगभग २५ वर्ष तक बड़ा करते हैं और उसे अपने पैरों पर खड़ा करते हैं। फिर वह बड़ा होकर अपने माता-पिता का सहारा बन जाता है। उसी तरह हमें प्रकृति का पालन-पोषण लगभग २५ वर्ष तक करना होगा। पर्यावरण की रक्षा करना होगी। अधिक से अधिक पौधे लगाकर वर्षों तक उनकी देखभाल कर वृक्ष बनने का इंतजार करना होगा। पानी का मितव्ययता से उपयोग करना होगा। मिट्टी को उपजाऊ बनाना होगा,तभी हम आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति का उपहार सौगात के रूप में दे पाएंगे ।
तभी आने वाली पीढ़ी,हमारे बच्चे एक बार पुनःप्रकृति की गोद में पलने लगेंगे। पक्षी हमारे आँगन में चहचहाने लगेंगे। बच्चे खुली और स्वच्छ हवा में साँस ले सकेंगे। कोयल की कूक और पक्षियों की आवाज सुन पाएंगे। रंग-बरंगी तितलियों को पास से देख पाएंगे। प्रकृति के सौंदर्य का आनंद ले सकेंगे।प्रकृति को आप जितना देंगे,उससे कहीं अधिक प्राप्त करेंगे। प्रकृति हमारी धरोहर है, सहेज कर रखिए ।

परिचय–डॉ.पूर्णिमा मण्डलोई का जन्म १० जून १९६७ को हुआ है। आपने एम.एस.सी.(प्राणी शास्त्र),एम.ए.(हिन्दी), एम.एड. करने के बाद पी.एच-डी. की उपाधि(शिक्षा) प्राप्त की है। वर्तमान में डॉ.मण्डलोई मध्यप्रदेश के इंदौर स्थित सुखलिया में निवासरत हैं। आपने १९९२ से शिक्षा विभाग में व्याख्याता के पद पर लगातार अध्यापन कार्य करते हुए विद्यार्थियों को पाठय सहगामी गतिविधियों में मार्गदर्शन देकर राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर सफलता दिलाई है। विज्ञान विषय पर अनेक कार्यशाला-प्रतियोगिताओं में सहभागिता करके पुरस्कार प्राप्त किए हैं। २०१० में राज्य विज्ञान शिक्षा संस्थान(जबलपुर) एवं मध्यप्रदेश विज्ञान परिषद(भोपाल) द्वारा विज्ञान नवाचार पुरस्कार एवं २५ हजार की राशि से आपको सम्मानित किया गया हैl वर्तमान में आप जिला शिक्षा केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर सहायक परियोजना समन्वयक के रुप में सेवाएं दे रही हैंl कई वर्ष से लेखन कार्य के चलते विद्यालय सहित अन्य तथा शोध संबधी पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कविता प्रकाशित हो रहे हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य अपने लेखन कार्य से समाज में जन-जन तक अपनी बात को पहुंचाकर परिवर्तन लाना है।