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अपनी ही रगों का खून माँगता है

कविता जयेश पनोत
ठाणे(महाराष्ट्र)
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क्या कोई मजहब,
लाशों की भीड़ माँगता है ?
अपने ही बागों के गुलाबों की,
मूर्छित तस्वीर माँगता है ?
ये तो कुछ इन्सानों के मन में बैठा,
एक दरिन्दा है।
जो अपनी नफरत की प्यास बुझाने,
हिंसा की ज्वाला भड़का
अपनी ही रगों का खून माँगता हैll