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सुसंस्कार ही दहेज

डॉ.चंद्रदत्त शर्मा ‘चंद्रकवि’
रोहतक (हरियाणा)
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घनश्यामदास जी कभी शहर के प्रसिद्ध सेठ होते थे,पर समय के फेर ने सब कुछ ढेर कर दिया। उनका सारा व्यापार डूब चुका था। स्थिति यह हो गई कि,घर बेचकर अब किराए पर रहने लगे। उनके इकलौते पुत्र रमेशचंद्र की शादी हुई,घर में बहू जो आई,निश्चय ही लक्ष्मी आ गई। कुछ समय बाद बहू असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हो गई। एक दिन बहू ने कहा,-“चलो बाबूजी! आपको एक उद्घाटन में चलना है। आपको चीफ गेस्ट बनाया गया है।”
“अरे बेटा! मैं…क्या करूंगा ?” लेकिन बहू के आग्रह को नहीं टाल सके।
सेक्टर सात रोहतक में आकर जब देखा कि,एक दुमंजिली इमारत जिस पर उसके नाम की प्लेट लगी है,तो उसका मुँह खुला का खुला रह गया। रिबन काटते हुए उसने कहा,-“सच में सुसंस्कार ही सच्चा दहेज है।” तालियों की गूंज सुनकर पड़ोसी भी शरीक होने लगे।

परिचय–डॉ.चंद्रदत्त शर्मा का साहित्यिक नाम `चंद्रकवि` हैl जन्मतारीख २२ अप्रैल १९७३ हैl आपकी शिक्षा-एम.फिल. तथा पी.एच.डी.(हिंदी) हैl इनका व्यवसाय यानी कार्य क्षेत्र हिंदी प्राध्यापक का हैl स्थाई पता-गांव ब्राह्मणवास जिला रोहतक (हरियाणा) हैl डॉ.शर्मा की रचनाएं यू-ट्यूब पर भी हैं तो १० पुस्तक प्रकाशन आपके नाम हैl कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचना प्रकाशित हुई हैंl आप रोहतक सहित अन्य में भी करीब २० साहित्यिक मंचों से जुड़े हुए हैंl इनको २३ प्रमुख पुरस्कार मिले हैं,जिसमें प्रज्ञा सम्मान,श्रीराम कृष्ण कला संगम, साहित्य सोम,सहित्य मित्र,सहित्यश्री,समाज सारथी राष्ट्रीय स्तर सम्मान और लघुकथा अनुसन्धान पुरस्कार आदि हैl आप ९ अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में शामिल हो चुके हैं। हिसार दूरदर्शन पर रचनाओं का प्रसारण हो चुका है तो आपने ६० साहित्यकारों को सम्मानित भी किया है। इसके अलावा १० बार रक्तदान कर चुके हैं।

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