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किसान विधेयकों पर व्यर्थ का टकराव

ललित गर्ग
दिल्ली

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राज्यसभा में विपक्ष द्वारा कृषि विधेयकों के विरोध प्रकट करने का असंसदीय एवं आक्रामक तरीका,सत्तापक्ष एवं विपक्ष के बीच तकरार,८ सांसदों का निलंबन और इन स्थितियों से उत्पन्न संसदीय गतिरोध लोकतंत्र की गरिमा को धुंधलाने वाले हैं। अपने विरोध को विराट बनाने के लिए सार्थक बहस की बजाय शोर-शराबा और नारेबाजी की स्थितियां कैसे लोकतांत्रिक कही जा सकती है ? जिन सांसदों को राज्यसभा से निलंबित किया गया है,उनके पक्ष में आधे से ज्यादा विपक्ष एकजुट हो गया है,कहां निभा रहा विपक्ष अपनी भूमिका ? इससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि किसान हित के नाम पर अपने-अपने अहं की चिन्ता एवं बिना विधेयकों की मूल भावना को समझे विरोध की राजनीति की जा रही है। विपक्ष इन कानूनों के खिलाफ आम जनता एवं किसानों को बरगलाने,भ्रमित एवं गुमराह करने के लिए छल-कपट एवं झूठ का जमकर सहारा ले रहा है।
संसदीय लोकतंत्र की अपनी मर्यादाएं हैं,वह पक्ष-विपक्ष की शर्तों से नहीं,आपसी सहमति की राजनीति से चलता है। विपक्ष की प्रमुख ३ मांगों में से सबसे बड़ी मांग यह है कि सांसदों का निलंबन वापस लिया जाए। इसका मतलब तो यह हुआ कि विपक्ष चाहता है कि पीठासीन अधिकारी के समक्ष की गई अभद्रता एवं आक्रामकता की अनदेखी कर दी जाए ? इससे तो संसदीय मर्यादाएं बार-बार भंग होती रहेगी एवं संसद में हुड़दंग मचाने,अभद्रता प्रदर्शित करने एवं हिंसक घटनाओं को बल देने के परिदृश्य बार-बार उपस्थित होते रहेंगे। गलत को गलत न मानने की हठ को कैसे स्वीकार्य किया जा सकता है ?
विडम्बनापूर्ण स्थिति तो यह है कि,जब सत्तापक्ष सांसदों के निलंबन रद्द करने पर विचार करने को तैयार है,तब फिर विपक्ष को भी चाहिए कि वह अपना हठ त्यागें। यह विपक्ष की हठधर्मिता ही है कि निलंबित सांसद राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश की सद्भावना पहल पर भी झुकने को तैयार नहीं है। संसद भवन के प्रांगण में धरने पर बैठे विपक्षी सांसदों के लिए जब उप-सभापति चाय लेकर पहुंचे,तब भी बात नहीं बनी। एक तरह से साबित हो गया कि, भारतीय राजनीति में परस्पर विरोध कितना जड़ एवं अव्यावहारिक है। हमारे राजनेता जब टकराव पर उतरते हैं,तो शायद नहीं सोचते कि देश में क्या संदेश जा रहा है। क्या भारतीय राजनीति में आज इतनी शालीनता भी नहीं बची कि,अपनी गलती को स्वीकार कर आगे ऐसी त्रासद घटनाओं के न होने के लिए संकल्पित हो।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम लोकतांत्रिक आचरण और काबिलियत को एक स्तर तक भी नहीं उठा सके हैं। संसद के सदस्यों के सदन के भीतर व्यवहार करने और आचरण करने की पूरी नियमावली है,परन्तु अब तक इसका पालन करने में लगातार कोताही बरती गई है,जिसकी वजह से सदन के भीतर कभी-कभी वातावरण असहज,अशालीन एवं असभ्य बनता रहा है। नेता और नायक किसी कारखाने में पैदा करने की चीज नहीं हैं,उनकी काबिलियत और चरित्र को गढ़ने का काम भी लोकसभा-राज्यसभा ही करती है। संविधान की शब्दधाराओं को ही नहीं,उसकी भावना को महत्व देने के गुणों का विकास भी यहीं से होता है। बोलने की आजादी का सदुपयोग करना भी यहीं पर सिखाया जाता है। भारत का लोकतंत्र दुनिया का आदर्श लोकतंत्र इसलिए है कि यहां जहां विपक्ष को अपनी बात कहने का अधिकार है,वहीं सत्तापक्ष की यह जिम्मेदारी है कि वह उसकी बात सुने,लेकिन यह कैसे संभव है कि कोई एक पक्ष अपनी मनमर्जी करे,जो वह चाहे वहीं सदन में हो,यह कैसे संभव है ? यदि जबरन विधेयक पारित नहीं कराने चाहिए तो उन्हें बलपूर्वक रोका भी नहीं जाना चाहिए।
विपक्ष यदि कमजोर होकर सत्तापक्ष के शासन में अनुचित अड़ंगा लगाता है,तो इसे लोकतंत्र को आहत करना ही कहा जाएगा। कृषि विधेयकों के पारित होते समय ऐसा ही दृश्य उपस्थित हुआ। जब सत्तापक्ष एवं विपक्ष दोनों ही किसानों के हित के लिए तत्पर हैं तो किसानों के हितों से जुड़े विधेयकों पर विरोध के बादल क्यों मंडराए ? विपक्ष की कृषि विधेयकों से जुड़ी २ मांगें विचारणीय है,जिन पर आम-सहमति बननी चाहिए। भला इन मांगों को मनवाने के लिए संसद का विरोध क्यों ? संसद का कामकाज क्यों बाधित किया जाए। यह त्रासद स्थिति ही है कि जब किसानों को यह संदेश देने की जरूरत है कि संसद उनके हितों की रक्षा को तत्पर है,तब पक्ष-विपक्ष में टकराव एवं तकरार राजनीति की विसंगतियों को ही उजागर कर रही है।

देश हित के महत्वपूर्ण विधेयकों के बनने में बाधा डालना राजनीतिक विसंगति का ही द्योतक है,जबकि रणनीति ऐसी होनी चाहिए कि छोटे,मध्यम और बड़े गाँव शहरों से सीधे जुड़ सकें,देशहित के मुद्दों पर सकारात्मक राजनीति की पहल हो। हमें सिर्फ यह नहीं सोचना चाहिए कि,शहरों में रहने वाले लोगों की आय बढ़े। किसानों की आमदनी एवं गाँवों की खुशहाली किस तरह से बढ़े,इस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है और कृषि विधेयक इन्हीं महत्वपूर्ण दिशाओं पर केन्द्रित हैl किसान तभी मजबूत होगा,जब वह देश के किसी दूसरे कोने में जाकर अपना उत्पाद बेच सकेगा,पर इसके साथ ही मंडी और एमएसपी की मौलिक भारतीय व्यवस्था को भी मजबूत रखने की जरूरत है। केन्द्र सरकार इन्हीं बातों को बार-बार दोहरा चुकी है कि मंडी और समर्थन मूल्य की व्यवस्था बनी रहेगी। ऐसे में अविश्वास एवं विरोध भारतीय राजनीति या किसान समाज में क्यों पैदा हो रहा है,उसे दूर करने की जिम्मेदारी भले सरकार पर ज्यादा हो,लेकिन इस कार्य में विपक्ष को भी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।

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