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छीन लेता है

वकील कुशवाहा आकाश महेशपुरी
कुशीनगर(उत्तर प्रदेश)

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कभी रोटी कभी कपड़े कभी घर छीन लेता है,
हमारी नौकरी ही वो सितमगर छीन लेता है।

महल के वास्ते ज़ुल्मों सितम की इन्तेहाँ देखो,
लगा कर आग मुफ़लिस का वो छप्पर छीन लेता है।

चमन को तुम बचाना ऐ मेरे भाई सुनो उससे,
वो फूलों की नज़ाकत को मसलकर छीन लेता है।

नहीं तुम हाथ फैलाना किसी भी शख़्स के आगे,
कि जो देता,वही सम्मान अक्सर छीन लेता है।

नहीं पूरे दिया करता उन्हें पैसे पसीने के,
निवाले भी गरीबों से उलझकर छीन लेता है।

हमारा हक नहीं ‘आकाश’ देतीं हैं ये सरकारें,
जो बचता है उसे ज़ालिम मुकद्दर छीन लेता है॥

परिचय–वकील कुशवाहा का साहित्यिक उपनाम आकाश महेशपुरी है। जन्म तारीख १५ अगस्त १९८० एवं जन्म स्थान ग्राम महेशपुर,कुशीनगर (उत्तर प्रदेश)है। वर्तमान में भी कुशीनगर में ही हैं,और स्थाई पता यही है। स्नातक तक शिक्षित श्री कुशवाहा क़ा कार्यक्षेत्र-शिक्षण(शिक्षक)है। आप सामाजिक गतिविधि में कवि सम्मेलन के माध्यम से सामाजिक बुराईयों पर प्रहार करते हैं। आपकी लेखन विधा-काव्य सहित सभी विधाएं है। किताब-‘सब रोटी का खेल’ आ चुकी है। साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आपको गीतिका श्री (सुलतानपुर),साहित्य रत्न (कुशीनगर) शिल्प शिरोमणी सम्मान (गाजीपुर)प्राप्त हुआ है। विशेष उपलब्धि-आकाशवाणी से काव्यपाठ करना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-रुचि है।

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