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गंंभीरता

डॉ.पूर्णिमा मंडलोई
इंदौर(मध्यप्रदेश)

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घर-परिवार स्पर्धा विशेष……

सरला के ३ बेटे और बहुएं थी। सबसे छोटे बेटे की शादी को अभी लगभग १ साल ही हुआ था। छोटी बहू अभी घर में पूरी तरह से घुल- मिल नहीं पाई थी। तीनों में अक्सर विवाद होता रहता था। आज तो सरला की तीनों बहुओं में जमकर कहा-सुनी हुई। दोनों बड़ी बहूएं तो कम ही बोल रही थी,परंतु छोटी बहू किसी के रोके नहीं रुक रही थी। आपस में तीनों बहुओं के विचार बिल्कुल नहीं मिलते थे। मिलेंगे भी कैसे ? तीनों अलग-अलग घरों से आई है। उनकी परवरिश भी अलग-अलग प्रकार से हुई है। फिर भी दोनों बड़ी बहूओं में कम ही मतभेद होते थे। उन दोनों को सरला की सीख जो मिली थी।
तीनों में एक बात तो समान थी। तीनों नौकरी नहीं करती थी। मारवाड़ी परिवारों में भाइयों के व्यवसाय शामिल में होने से परिवार भी बंधा ही रहता है,परंतु जब से छोटी बहू आई है तब से ऐसा लगता है अब अलगाव होकर ही रहेगा। जब भी तीनों में अनबन होती तो छोटी अपने पति के आने पर सारी बात पति को बता देती थी। आज तो हद ही हो गई। रोज-रोज की बातें सुनकर बेटा-बहू अलग घर बसाने की बात करने लगे।
सरला यह सब देख रही थी। जब से छोटी बहू घर में आई है,तब से उसे समझाना चाहती थी कि घर में सब के साथ कैसा बर्ताव करना और कैसे परिवार में सबको बांधकर रखा जाता है,परंतु सोच रही थी कि जब सिर से पानी ऊपर होने लगेगा,तब ही हस्तक्षेप करूंगी। आज वह दिन आ ही गया। सरला ने आज बेटे-बहू को सिर्फ यह कह कर रोक लिया कि कुछ दिन रुक जाओ,फिर चले जाना।
कुछ दिन तो सब ठीक चलता रहा,परंतु फिर एक दिन किसी बात पर तीनों बहुओं में कहासुनी होने लगी‌। तब सरला ने बीच में बोलना उचित समझा और छोटी बहू को अलग कमरे में ले जाकर समझाने लगी। सरला ने कहा-छोटी आज तुम जो इतना बड़ा कारोबार देख रही हो ना, यह सब मिल-जुलकर रहने का ही परिणाम है। हम भी ४ बहुएं थी। हमारी सास और हममें कभी बच्चों की वजह से या किसी काम को लेकर कहा-सुनी हो जाया करती थी,परंतु जब शाम को हमारे पति थक कर घर आते तो हम सब एकदम चुप हो जाया करती थी। ऐसा व्यवहार करती कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। कभी भी हमारे पतियों को हमारी किसी बात का पता नहीं चला। हम आपस में ही सब सुलह कर लेती थी। इस तरह से हम सब में प्रेम भी बना रहा और परिवार भी टूटने से बच गया। चार बर्तन होते हैं,वो आपस में बजते तो हैं। उसी तरह घर में ४ सदस्य होंगें तो कहा-सुनी तो होगी ही। तुम सम्मान दोगी तो सम्मान ही मिलेगा और प्यार दोगी तो प्यार ही मिलेगा। कभी-कभी बातों को सहन कर गंभीरता रखने से परिवार में एकता बनी रहती है। सरला की बातों का शायद छोटी बहू पर कुछ असर हो रहा था। सरला ने उसके चेहरे को पढ़ लिया था।
धीरे-धीरे समय बीतता गया। कभी तीनो बहुएं आपस में लड़तीं,फिर एक हो जाती तो कभी उनके ठहाके सुनाई देते। सरला को गए आज लगभग १० वर्ष हो चुके हैं। अभी भी तीनों बहू-बेटे साथ साथ ही रह रहे हैं। घर में सबके बच्चे भी साथ साथ ही बड़े हो रहे हैं।

परिचय–डॉ.पूर्णिमा मण्डलोई का जन्म १० जून १९६७ को हुआ है। आपने एम.एस.सी.(प्राणी शास्त्र),एम.ए.(हिन्दी) व एम.एड. के बाद पी-एच. डी. की उपाधि(शिक्षा) प्राप्त की है। डॉ. मण्डलोई मध्यप्रदेश के इंदौर स्थित सुखलिया में निवासरत हैं। आपने १९९२ से शिक्षा विभाग में सतत अध्यापन कार्य करते हुए विद्यार्थियों को पाठय सहगामी गतिविधियों में मार्गदर्शन देकर राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर सफलता दिलाई है। विज्ञान विषय पर अनेक कार्यशाला-स्पर्धाओं में सहभागिता करके पुरस्कार प्राप्त किए हैं। २०१० में राज्य विज्ञान शिक्षा संस्थान (जबलपुर) एवं मध्यप्रदेश विज्ञान परिषद(भोपाल) द्वारा विज्ञान नवाचार पुरस्कार एवं २५ हजार की राशि से आपको सम्मानित किया गया हैL वर्तमान में आप सरकारी विद्यालय में व्याख्याता के रुप में सेवारत हैंL कई वर्ष से लेखन कार्य के चलते विद्यालय सहित अन्य तथा शोध संबधी पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं कविता प्रकाशन जारी है। लेखनी का उद्देश्य लेखन कार्य से समाज में जन-जन तक अपनी बात को पहुंचाकर परिवर्तन लाना है।