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ताजमहल

बिमल तिवारी ‘आत्मबोध’
देवरिया(उत्तरप्रदेश)
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काव्य संग्रह हम और तुम से


ना शाहजहां की चाह महल है,
ये ना कोई दरगाह पहल है
छूकर देखो इसके पत्थर को,
इसमें जिंदा मुमताज़ महल है।

चाहत की ना ये बस निशानी,
इसमें सोई है इक शोख़ जवानी
जिसकी धड़कन सुनता है आकर,
पीर,फ़क़ीर,गमज़दा या आह रूहानी।

इसकी नक्काशी बयां है परी का,
जिसमें अंकित फ़रमान ख़ुशी का
जिसका संगमरमर चाँद ज़मीं का,
जिसमें दिखती हर रात पूनम का।

हर पूनम रातों में दिखता इक साया,
जिसे चाँद ज़मीं पर ढूंढने आया।
ताजमहल के हर शज़र पर,
लगता शाहजहां जिंदा हो आया॥

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