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बादल बन जाता…

सुरेश चन्द्र ‘सर्वहारा’
कोटा(राजस्थान)
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कितना अच्छा यह होता जो
मैं भी इक बादल बन जाता,
आसमान में कभी कहीं भी
घूम घूम रहता इतराता।
सागर-सागर पानी लेकर
संग हवा के खेला करता,
पर्वत-पर्वत दौड़ लगाता
आँधी से मैं कभी न डरता।
हाथ पकड़ सूरज-किरणों का
मैं हँसता-गाता-मुस्काता,
कड़क-कड़क कर खूब गरजता
अपने में बिजली चमकाता।
भटक गए जो नन्हें बादल
ठीक राह मैं उन्हें सुझाता,
हल्की-हल्की वर्षा करके
धरती माँ की प्यास बुझाता।
इन्द्रधनुष मैं कभी खिलाकर
बच्चों को मुस्कानें देता।
जितना भी संभव हो पाता,
ताप धरा का मैं हर लेता॥

परिचय-सुरेश चन्द्र का लेखन में नाम `सर्वहारा` हैl जन्म २२ फरवरी १९६१ में उदयपुर(राजस्थान)में हुआ हैl आपकी शिक्षा-एम.ए.(संस्कृत एवं हिन्दी)हैl प्रकाशित कृतियों में-नागफनी,मन फिर हुआ उदास,मिट्टी से कटे लोग सहित पत्ता भर छाँव और पतझर के प्रतिबिम्ब(सभी काव्य संकलन)आदि ११ हैं। ऐसे ही-बाल गीत सुधा,बाल गीत पीयूष तथा बाल गीत सुमन आदि ७ बाल कविता संग्रह भी हैंl आप रेलवे से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त अनुभाग अधिकारी होकर स्वतंत्र लेखन में हैं। आपका बसेरा कोटा(राजस्थान)में हैl

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