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सउदी अरब में तख्ता-पलट ?

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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सउदी अरब के राज-परिवार में जबर्दस्त उथल-पुथल मची हुई है। बादशाह सलमान ८४ साल के हो गए हैं। वे अस्वस्थ भी रहते हैं। राज-परिवार के कई शाहजादों में बादशाहत की होड़ लगी हुई है। इस समय जिन्हें युवराज बना रखा है,वे हैं-बादशाह सलमान के बेटे मोहम्मद ! ये मोहम्मद वही हैं जो सारी दुनिया में २ साल पहले बदनाम हो गए थे,तुर्की में प्रसिद्ध पत्रकार जमाल खाशोग्गी की हत्या करवाने के लिए। मोहम्मद काफी तेज-तर्रार युवराज हैं। उन्होंने सउदी अरब के पुराने ढर्रे की कई रुढ़ियों को उलट-पुलट दिया है। उन्होंने अनेक प्रगतिशील कदम भी उठाए हैं,जिनसे कई पोंगापंथी मुल्ला-मौलवी नाराज हैं और राजमहल के अन्य कई शहजादे उनसे पिंड छुड़ाने के लिए कमर कसे हुए हैं। अब उन्होंने राजमहल के ३ शहजादों और उनके समर्थक कई अफसरों को गिरफ्तार और नजरबंद कर लिया है। उन्हें आजन्म कारावास या मौत की सजा,दोनों में से कुछ भी मिल सकता है। यह घटना औरंगजेब और दाराशिकोह की याद दिला रही है। खुद मोहम्मद ने २०१७ में अपने ताऊ के बेटे,बड़े भाई और युवराज मोहम्मद बिन नाएफ को एक तख्ता-पलट में उलट दिया था और खुद युवराज बन बैठे थे। जब २०१६ में बिन नएफ युवराज बने थे तो यही मोहम्मद बिन सलमान घुटने के बल बैठकर उनका हाथ चूमते हुए दिखाई पड़े थे। जब उन्होंने युवराज पद हासिल कर लिया तो राज परिवार के कई तीसमारखां शहजादों को उन्होंने एक होटल में नजरबंद कर दिया था। इन सब बागी शहजादों पर आरोप है कि वे मुल्ला-मौलवियों और कबाइलियों से मिलकर सउदी अरब के राज सिंहासन पर कब्जा करना चाहते हैं। इस काम के लिए उन्होंने कई विदेशी शक्तियों से भी संपर्क बना रखे थे। ऐसा माना जा रहा है कि इन सबके ख़िलाफ़ यह सारी कार्रवाई बादशाह सलमान की जानकारी और सहमति से हो रही है। इस कार्रवाई से युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने राजगद्दी पर शिकंजा काफी मजबूत कर लिया है। इस समय ‘कोरोना’ वायरस की वजह से तेल की कीमतें गिर रही हैं और मक्का-मदीना की तीर्थ-यात्रा (उमरा) भी स्थगित कर दी गई है। शायद हज-यात्रा भी स्थगित हो जाए। सउदी अरब के लिए इस तरह एक बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है। युवराज मोहम्मद की महत्वकांक्षा है कि २०३० तक वे ऐसा माहौल बना दें कि सउदी अरब तेल की बजाय ३ करोड़ तीर्थ-यात्रियों से होने वाली आमदनी से अपनी अर्थ-व्यवस्था को मजबूत
बनाएं।

परिचय–डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।