रचना पर कुल आगंतुक :114

ट्रेन और शौचालय…!!

तारकेश कुमार ओझा
खड़गपुर(प. बंगाल )

**********************************************************

ट्रेन के शौचालय(टॉयलेट्स) और यात्रियों में बिल्कुल सास-बहू-सा संबंध है। पता नहीं, लोग कौन-सा असंतोष इन शौचालय पर निकालते हैं। आजादी के इतने सालों बाद भी देश में चुनाव शौचालय के मुद्दे पर लड़े जाते हैं। किसने कितने शौचालय बनवाए,और किसने नहीं बनवाए,इस पर सियासी रार छिड़ी रहती है। देश की नामचीन हस्तियाँ शौचालय पर फिल्में बनाती हैं और कमाई करती है। जिनसे यह नहीं हो पाता,वो विज्ञापन के जरिए ही मुट्ठी गर्म करने की कोशिश में रहती हैं। दूसरे मामलों के बनिस्बत शौचालय में विशेष सुविधा है। रसगुल्ला खाकर रस पीने की तर्ज पर हस्तियाँ इसकी आड़ में फिल्म और विज्ञापन से कमाई भी करते हैं,तिस पर मुलम्मा यह कि बंदा बौद्धिक है। फिल्म और विज्ञापन के जरिए शौचालय की महत्ता का संदेश समाज को दे रहा है।
‘शौचालय एक महागाथा’ की तर्ज पर शौचालय से शासकीय अधिकारियों का पाला भी पड़ता रहता है। कुछ दिन पहले मेरे क्षेत्र में हाथियों के हमलों में ग्रामीणों की लगातार मौत से दुखी एक शासकीय अधिकारी दौरे पर निकल पड़े। एक गाँव में उन्हें निरीक्षण की सूझी। इस दौरान वे यह जानकर दंग रह गए कि सरकार ने गाँव में ६३ घरों में सरकारी अनुदान से शौचालय तो बना दिए, लेकिन इस्तेमाल एक का भी नहीं हो रहा है। सबमें ताले पड़े हैं। ग्रामीण आदतन जंगल जाते हैं और वहां जानवरों के हमलों का शिकार होते हैं। फिर तो अधिकारी का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। फिर क्या…आनन-फानन जांच और निगरानी समिति गठित हुई। हालांकि,ग्रामीणों की आदत में सुधार हुआ या नहीं,इसका ध्यान नहीं लिया जा सका।
यात्रा के दौरान ट्रेन के शौचालय स्वाभाविक स्थिति में भी नजर आ जाए तो सुखद आश्चर्य होता है। याद नहीं पड़ता कि साधारण दर्जे की किसी यात्रा में ट्रेन के शौचालय सही-सलामत मिले हों। कभी पानी उपलब्ध तो यंत्रादि टूटे,कभी बाकी सब ठीक तो पानी गायब…। बचपन में लोकल ट्रेन में सफर से इसलिए डर लगता था कि,उसमें शौचालय नहीं होते थे। हाल में ‘मेमू’ लोकल में इसकी व्यवस्था हो तो गई,लेकिन कुछ दिन पहले गोमो- खड़गपुर मेमू लोकल से यात्रा के दौरान जायजा लिया तो डिब्बों के शौचालय इस हाल में मिले…कि,कुछ महीने पहले की पुरानी यात्रा की याद ताजा हो गई। वही टूटे नल,बेसिन में प्लास्टिक की बोतलें और शौचालय के पास गुटखा-पान की पीक वगैरह…। लोग कहते हैं इसके लिए व्यवस्था दोषी है। व्यवस्था कहती है कि हम सुविधाएं देते हैं,लोग तोड़फोड़ और गंदगी फैलाते हैं तो हम क्या करें…! आखिर कहां तक हम व्यवस्था सुधारते रहें..! सचमुच ‘शौचालय एक महागाथा…।’

परिचय-तारकेश कुमार ओझा का नाम खड़गपुर में वरिष्ठ पत्रकार के रुप में जाना जाता है। आपका निवास पश्चिम बंगाल के खड़गपुर स्थित भगवानपुर (जिला पश्चिम मेदिनीपुर) में है। आपकी लेखन विधा अनुभव आधारित लेख,संस्मरण और सामान्य आलेख है।श्री ओझा का जन्म स्थान प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) हैl पश्चिम बंगाल निवासी श्री ओझा की शिक्षा बी.कॉम. हैl कार्यक्षेत्र में आप पत्रकारिता में होकर उप सम्पादक हैंl आपको मटुकधारी सिंह हिंदी पत्रकारिता पुरस्कार तथा श्रीमती लीलादेवी पुरस्कार के साथ ही बेस्ट ब्लॉगर के भी कई सम्मान मिल चुके हैंl आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंl  

Leave a Reply