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आज रहने दो

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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आज रहने दो अपरिचित
आज रहने दो अकेले,
बरस ले यह घिरा घन भी
आर्द्र चितवन के ये मेले।

फूटते उर के मृदुल स्वर
आज सुधि नर्तन की आई,
घुँघरूँओं की खनक सुनना
नूपुरों के मन को भाई।

आवास भू अंचल मिला
राह तुम पाथेय खोलो,
वेदना-जल, स्वप्न-शतदल
जुगनुओं आ करके बोलो।

प्राण हँस कर कह रहा है,
अमरता के बीज बोना।
बुझे दीपक फिर जला कर
समय को मत व्यर्थ खोना॥