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गंध

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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     जब से ईरान, अमेरिका और इजराइल का युद्ध शुरू हुआ है, मनीषा की नजरें टी.वी. न्यूज से नहीं हटतीं थीं। उसके पति भी तो फौज में हैं, जाने कब लड़ाई छिड़ जाए!

आकाश में उड़ते ड्रोन, मिसाइल, गोलियों की आवाजें, लोगों की चीख-पुकार और उनके चेहरे पर फैली उदासी की कल्पना कर वह परेशान और उदास हो उठती। कोई भी देश अपने अहम् के कारण रुकने और झुकने को तैयार नहीं हो रहे थे। पूरा परिवार चिंतित और परेशान-सा टी.वी. के सामने बैठा हुआ था। मानवता का हनन सभी के दिलो-दिमाग पर छाया हुआ था। ऐसा महसूस हो रहा था, कि मिसाइल, बारूद और मौत की गंध मानों कमरे के अंदर फैल रही है।

   बेचारी मासूम जनता कैसे मारी जा रही है। सत्ताधारियों का दिल जैसे पत्थर का हो गया है। लोगों की इंसानियत और संवेदनाएं मर चुकी हैं। भला इस तरह से युद्ध किया जाता है..! वह मन ही मन बुदबुदा रही थी।

   इंसान की कोई कीमत ही नहीं है जैसे… यहाँ तो १ मच्छर या काकरोच को मारने के पहले दस बार सोचना पड़ता है। और इन्हें देखो, किस तरह से इंसानों की हत्या करते चले जा रहे हैं।

तभी किचन से बाई की आवाज आई ”दीदी, दीदी“

“क्या हुआ ?”

“काकरोच घूम रहा है”, कहते हुए वह रसोई से बाहर निकल कर खड़ी हो गई।

“इतनी बड़ी औरत जरा से काकरोच से डरती है”। वह कुर्सी पर चढ़ कर खड़ी थी।

“पगली जरा से काकरोच से इतना डरती है”, कह कर वह हँस पड़ी।

मनीषा ने तुरंत फिनिट का स्प्रे काकरोच पर कर दिया। वह तड़प कर ठंडा हो गया था।

  अब कमरे में बारूद की गंध की जगह फिनिट की गंध भर गई थी।