बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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उसके भीतर
एक उम्र नहीं,
कई-कई उम्रें टूटती रहती हैं
बिना किसी आवाज़ के।
चेहरे पर सामान्य दिनों की धूल जमी रहती है,
पर आत्मा में
लगातार गिरते रहते हैं
कुछ अदृश्य मकान।
मैंने देखा है,
कुछ लोग पूरी ज़िंदगी
सिर्फ़ लौटने की इच्छा में जीते हैं।
वे अपने भीतर
एक पुराना आँगन बचाए रखते हैं,
जहाँ माँ की पुकार अब भी गूँजती है
जहाँ पेड़ों की छाया,
अब भी उन्हें पहचानती है।
हालाँकि वे जानते हैं,
कि समय की कोई पगडंडी
उल्टी दिशा में नहीं जाती,
और टूटने के बाद
मनुष्य उसी जगह
कभी वापस नहीं पहुँचता,
जहाँ से वह बिखरा था।
स्मृतियाँ,
बाहर से बहुत विनम्र दिखती हैं
वे किसी पुराने संदूक में रखे
पीले पड़ चुके ख़तों जैसी लगती हैं,
पर भीतर वे
धीरे-धीरे खाती रहती हैं मनुष्य को
जैसे बंद अलमारी में
सीलन कपड़ों का रंग चुरा लेती है,
जैसे दीमक,
लकड़ी के भीतर से
उसका समूचा भरोसा खोखला कर देती है।
मैं भूलना नहीं चाहती,
क्योंकि भूल जाना
उन लोगों के साथ विश्वासघात है,
जिन्होंने कभी मेरे भीतर
प्रेम, उम्मीद और अर्थ बोया था।
लेकिन हर स्मृति को,
अपने कंधों पर उठाए रहना भी
एक प्रकार की मृत्यु है
जहाँ आदमी चलता-फिरता है,
बातें करता है
हँसता हुआ दिखाई देता है,
पर उसके भीतर का नगर
बहुत पहले उजड़ चुका होता है।
मुझे यक़ीन है,
जब मैं अंतिम बार
अपने जीवन को पीछे मुड़कर देखूँगी,
तो मुझे अपनी उपलब्धियों की सूची याद नहीं आएगी।
न प्रशंसाएँ,
न प्रमाण-पत्र
न वे क्षण,
जिन्हें दुनिया सफलता कहती है।
मुझे याद आएँगी
कुछ अधूरी यात्राएँ,
कुछ स्टेशन
जहाँ उतरना था पर उतर न सकी,
कुछ छूटे हुए हाथ
जिन्हें थोड़ी देर और थामा जा सकता था।
कुछ शब्द,
जो कहे जाने से पहले ही
चुप्पियों में बदल गए,
और कुछ ऐसे घर
जहाँ से निकलते समय,
मैंने सोचा था
एक दिन लौटूँगी,
लेकिन फिर कभी लौट न सकी।
फिर भी,
मैं जाना चाहती हूँ
किसी पराजित यात्री की तरह नहीं,
न ही उन लोगों की तरह
जो अपनी चोटों को,
अपनी पहचान बना लेते हैं।
मैं जाना चाहती हूँ,
उस नदी की तरह
जो अपने रास्ते के हर पत्थर को जानती है,
जिसने पहाड़ों से गिरना सीखा है,
मैदानों में बिखरना सीखा है
सूखे मौसमों से गुज़रना सीखा है,
और जिसने यह भी सीखा है
कि चोटें दिशा बदल सकती हैं,
गति नहीं।
मैं अपने भीतर की समस्त टूटनों के साथ,
समुद्र तक पहुँचने का साहस रखना चाहती हूँ
क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी विजय
अक्षत रह जाना नहीं,
बार-बार बिखरकर भी
अपने भीतर बची हुई रोशनी को
संभाले रखना है।
मेरे भीतर तब भी
एक अधूरी सड़क बची होगी,
कुछ अनकहे वाक्य,
कुछ अपूर्ण इच्छाएँ,
कुछ दरवाज़े
जिन पर दस्तक देने का साहस
मैं कभी जुटा नहीं सकी।
और मेरी आँखों में,
दूर कहीं जलती हुई
एक छोटी-सी लौ बची रहेगी
वह लौ,
किसी भूगोल में दर्ज घर की नहीं होगी,
बल्कि उस जगह की होगी
जहाँ मनुष्य
अपनी सारी थकान,
सारी असफलताओं,
सारी क्षतियों के बाद भी
अपने होने का अर्थ खोज लेता है।
शायद वही घर है,
और शायद
जीवन का सबसे बड़ा साहस
लौट पाना नहीं,
बल्कि न लौट सकने की पीड़ा के साथ भी
प्रेम करना।
बहना,
और अंत तक
मनुष्य बने रहना है॥