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जीत का नशा…

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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मि. गुप्ता ने अपने इकलौते बेटे आरव को बचपन से ही एक ही बात घुट्टी की तरह पिलाई थी, कि जीवन में तुम्हें सदा प्रथम आना है। जीत का नशा मीठा ज़हर होता है। और मिस्टर गुप्ता ने यही अपने लाल को घोल कर पिलाया था।
    साइंस एक्जिबिशन के कॉम्पीटिशन में आरव का प्रोजेक्ट दूसरे राउंड में ही शॉर्ट सर्किट हो गया और स्क्रीन पर ‘डिस्क्वालिफाई’ चमक उठा। आरव ने अपने लिए पहले कभी ‘डिस्क्वालिफाई’ शब्द देखा नहीं था। उसका चेहरा सफेद पड़ गया और आँखों में आँसू आ गए। वह स्टेज से उतर कर सीधा वॉशरूम की ओर भागा और जोर से दरवाजा बंद कर लिया।
मि. गुप्ता कॉम्पीटिशन के आयोजकों से भिड़ गए और बोले ,”मेरे बेटे के साथ धाँधली और चीटिंग हुई है। वह हार ही नहीं सकता है।“
  तभी सफाईकर्मी भागता हुआ आया कि बच्चा दरवाजा बंद करके रो रहा है और वह दरवाजा भी नहीं  खोल रहा है। आप जल्दी चलिए।
“आरव दरवाजा खोलो, अगली बार तुम्हारा प्रोजेक्ट जरूर फर्स्ट आए
गा। तुम्हारे टीचर से हेल्प करने को कहूँगा।“
“नहीं पापा, मैं हार गया। अब आप मुझे प्यार नहीं करेंगें।“ उसकी सिसकियाँ हवा में गूँज रहीं थीं।
मि. गुप्ता का हाथ हवा में रुक गया था। उन्हें वह दिन याद आ गया, जब स्कूल में पैरेंटिंग वर्कशॉप में मशहूर साइकियाट्रिस्ट मि. अरुणा स्पीकर थीं और टॉपिक था, ‘बच्चों को हारना सिखाइए।‘
   उनका कहना था कि कॉम्पीटिशन जीतना अच्छी बात है, परंतु हर बार जीतने वाला बच्चा ज़िंदगी से डरने लगता है। उसे हार को स्वीकार करना भी सिखाइए।
  उस समय मि. गुप्ता ने अभिमान में डूब कर कहा था ,”अरुणा जी, मेरा बेटा लूजर नहीं पैदा हुआ है। मैं खुद हार सकता हूँ, लेकिन अपने बेटे को हारना नहीं सिखाऊँगा और सहन भी नहीं करूँगा।“
   आज उन्हें अपनी गलती का एहसास हो रहा था। वे दरवाजे के पास ही बैठ गए थे।
“आरव बच्चे बाहर आओ। तुम्हारे पापा से गलती हो गई। फर्स्ट आओगे तो पार्टी करेंगें। सेकण्ड आओगे तो चॉकलेट और हारोगे तो पापा की गोद…. पक्का प्रॉमिस करता हूँ।”
दरवाजा धीरे से खुल गया। आरव की आँखें सूजी हुईं थीं। गालों तक आँसुओं के निशान थे, लेकिन होंठ पर मीठी-सी मुस्कान थी और वह पापा से लिपट गया था।
उधर, माइक पर एनाउंसमेंट हो रहा था पार्टीसिपेशन इज विनिंग।
  मि. गुप्ता के कान में अरुणा जी की बात गूँज रही थी- बच्चों को हारना सिखाइए।