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डिग्रियों का मेला

दीप्ति खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
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आजकल की शिक्षा जैसे,
एक बड़ा-सा मेला है
जहां बिकता है ज्ञान कम,
बस डिग्रियों का रेला है।  

किताबें लगती बोझ अब,
नोट्स बने भगवान
रटकर जो पूरा लिख पाए,
वही बड़ा विद्वान।  

गुरु भी जकड़े हुए आज,
सिलेबस की जंजीरों में
किसी तरह बन जाए रिजल्ट 
कौन पड़े झमेले में ?

माता-पिता की बस यही आस,
बेटा उनका टॉप कर जाए
क्या सीखा, कैसे सीखा,
ये फालतू चर्चा क्यों की जाए ?

शिक्षक जो ज्ञान के दीपक हैं,
बुझे हुए से लगते हैं
रिजल्ट का प्रेशर है इतना,
बस इंपॉर्टेंट ही बता पाते हैं। 

घंटी बजी पीरियड खत्म,
ज्ञान प्रवाह रुक जाता है
टाइम-टेबल का खौफ इतना कि,
हर शिक्षक झुक जाता है। 

कोचिंग की गलियों में अब,
भविष्य का सौदा होता है
सपनों की कीमत लगती है,
पैसों से फैसला होता है।  

अंकों की अंधी दौड़ में
शार्ट-कट आगे बढ़ गया
डिग्रियों के इस खेल में,
असली हुनर घबरा गया। 

डिग्री लेकर निकला जब,
ज्ञान न संग अपने पाया
न हुनर न पकड़ विषय पर,
बस कागज का टुकड़ा हाथ आया। 

शिक्षा के इस मेले में,
सच्चा ज्ञान न मिल पाया।
गुरु की गरिमा हुई धुंधली,
बस डिग्रियों ने मन को भरमाया॥