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तरसती थी मेरी आत्मा

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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हर बार पितृपक्ष में तुमने मुझको ‘गया’ बिठाया,
जल अर्पित करके मोक्ष भी दिलाया
पंडितों को खिलाकर तुमने बड़ा है पुण्य पाया,
मेरे लाल क्या तुमको इतनी-सी भी खबर नहीं है।

तरसती थी मेरी आत्मा रोटी खाने को,
पड़े थे क्या तेरे घर में खाने को लाले
उस पल खाने को कुछ भी नहीं था क्या तेरे पास,
मैं रोई थी तब भी जब तुमने मुझको धकेल बिस्तर पर छोड़ा।

जब गीली हुई थी कपड़े में, दर्द में रोई बहुत थी,
ताकती रह गई थी तेरे बेटे के तिलक के बड़े भोज में
उस भोज में मिठाई-पूरी भी बनी थी,
दौड़ी-दौड़ी गई मैं चूल्हे के पास भी।

लेकिन वहाँ से मुझको धक्का देकर सभी ने भगाया,
सबने यही तो बोला बूढ़ी होकर,
शुद्ध-बुद्ध है कोई,
देखो यह कैसी बुद्धि ?

उस पल क्या तेरा ज़मीर ईश्वर से नहीं डरा था,
अब तुम चले हो मुझको पितृपक्ष में मोक्ष दिलाने
तुमको है डर ईश्वर का, मोक्ष की पड़ी है,
मेरी आत्मा उस पर कितनी रोई पड़ी थी।

भूख से बिलख-बिलख कर पत्तलों में जाकर ढूंढती थी पूरी,
या कोई मिठाई मुझको मिल जाती
उस गंदगी में वहाँ तेरी बेटी खड़ी मुझको देख रही थी,
डरती थी माँ से वह भी, पर मुझे प्रेम करती थी बहुत ही।

उस पत्तल में मैंने ढूंढी मिठाई और पूरी, खाया था भरपेट,
लेकिन आत्मा तो रोई थी उस दिन
लाखों लोग खाकर हाथ पोंछते हुए निकले,
तेरे भोज की कितनी तारीफ उस पर हुई थी।

जब मैं ढूंढती थी पूरी उस गंदगी में पत्तल के बीच,
कोई रसगुल्ला ही मिल जाता
बेटा, क्या तुम्हें उस पल समझ यह भी नहीं आई,
माँ की आत्मा है रोई, फिर पितृपक्ष में मोक्ष कैसे तुमको आएगा।

क्या तुमको दया नहीं आई…?
मैंने तुमको कोख से जन्म दिया,
इस माँ के पेट से तुम थे एक दिन निकले,
वही माँ आज पेट को टटोलकर रो रही है।

दो रोटी मिल जाती तो नींद अच्छी आज आती,
पितृपक्ष से तुमको मोक्ष क्या मिलेगा…
जब तेरी माँ एक दिन भूखी सोई थी,
जब तेरी माँ एक दिन भूखी सोई थी।

मेरे ही मरने पर लाखों लोग खाएंगे,
मैं बस मर कर, आत्मा यही देखेगी
कितने खुश हैं सब भोज खाकर, पंडितों से भी पुण्य में मोक्ष को पाकर,
मैं खुश फिर भी हो जाती, मेरा बेटा कितना अमीर आदमी है।

जो मेरे मरने पर भोज-भात कर रहा है,
भूल गई वह सब, पर जब मैं तेरी माँ भूखी ही मरी थी।
मोक्ष मिले तुमको मेरा लाल सदा ही खुश रहना,
माँ-बाप का आशीर्वाद सदा मिलता रहेगा॥