कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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आज वह बहुत याद आ रहा है,
याद आ रहा है वह पल, जब हम बाँहों में लिपटे थे।
तेरे दरवाज़े पर जाकर,
यादों में सिमट कर दिल-तेरी बाँहों में ही खो जाता है।
कैसे संभाल पाती हूँ धड़कन की तेज़ आवाज़ों को,
कभी महसूस किया तूने, मेरे मन को, कितना तड़पता है।
हवाओं ने मन को छेड़ा है,
यादों में सब कुछ पिरोया है।
रोम-रोम से महसूस कर रहा है दिल,
तेरे साथ की गर्माहट को, मन बड़ा बेचैन है।
क्यों तड़पता है दिल,
बस यादों में ही रहना चाहता है।
क्या कभी तुमने भी महसूस किया,
मेरे मन को, मेरे होने की खुशबू को।
क्या तुम्हारा दिल भी तड़पता होगा,
मुझे महसूस करने को।
नहीं रहा जाता अब तेरे बगैर,
आँसुओं में, तेरी यादों में जी रही हूँ,
हर पल याद कर जी रही हूँ।
कैसा मिलन था, कैसी छुअन थी,
किस जन्म की मोहब्बत अधूरी थी
मिला तो दिया ईश्वर ने, दिल में प्यार जगा ही दिया।
कभी किसी से इस तरह बात न हुई,
कभी ऐसी चाहत न जगी।
कभी यादों में किसी की आहट न रही,
मन न बहका कभी।
न चाहा किसी को इस कदर,
जैसे प्यार हुआ तुझसे।
कहाँ हुई कभी ऐसी मोहब्बत, जैसी हो गई तुझसे मोहब्बत॥