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पहला हार्ट अटैक

शीला बड़ोदिया ‘शीलू’
इंदौर (मध्यप्रदेश )
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तब की-पैड वाले फोन का चलन था। शाम को मेरा फोन बजा, पापा ने कहा “मेरी तबियत खराब है, भाई को लेकर जल्दी वैशाली नगर चौराहा डॉ. व्यास के यहाँ आ जाओ।”
मैंने पूछा,” क्या हुआ पापा ?”
बोले, “बस तुम लोग जल्दी आ जाओ। “
  भाई ने फटाफट बाइक निकाली और ५ मिनट में हम डॉ. व्यास के क्लिनिक पहुंच गए। डॉ. बोले, “जल्दी! आपके पापा को एम.वाय. ले जाकर एडमिट करो, इन्हें अटैक आया है।”
हम स्तब्ध रह गए, “पापा कैसे, कब आया ?
पापा बोले “बस में, अब जल्दी चलो।”
मैंने कहा, “पास ही के हॉस्पिटल चलते हैं। डॉ. बोले,”मैं महाराजा यशवंतराय होल्कर हॉस्पिटल का हृदय विभाग का हेड हूँ, मैं कॉल कर देता हूँ, अच्छा इलाज हो जाएगा, आप जल्दी ले जाओ।”
     पापा के चेहरे पर कोई डर, घबराहट नहीं थी। वे बस से अकेले क्लिनिक तक पैदल आए, गजब की हिम्मत थी, उनमें। किसी व्यक्ति को अटैक का पता चले तो टेंशन में व्यक्ति मर जाता है। ऑटो ढूंढ़ने में समय खराब होता, तो हम पापा को बाइक पर बैठाकर ही ले गए।
     शांत भाव से हमारे साथ बाइक पर बैठ गए। मुझे पता था, “मेरे पापा बहुत हिम्मत वाले हैं। ईश्वर से प्रार्थना कर रहीं थीं, सही समय पर हॉस्पिटल पहुंच जाए, पापा से भी बात कर रहीं थीं, “पापा कुछ नहीं होगा, सब ठीक हो जाएगा।” मैंने मामा को फोन लगा कर सारी बात बता दी, वे भी हॉस्पिटल के लिए निकल गए थे।
       हॉस्पिटल पहुंचकर, हमने जब काउन्टर पर बताया “डॉ. व्यास ने भेजा है, पापा को अटैक आया है।” जल्दी ही वार्ड बॉय को व्हील चेयर लेकर बुलाया, पर किस्मत जैसे पापा की परीक्षा ले रही थी, पापा बैठने को हुए कि चेयर टूट गयी।पहले तो हम उन्हें बाइक से लेकर आए, अब चेयर भी। पापा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, कि  उन्हें कोई परेशानी  है। बोले, “मैं चल लूँगा, चलो।”
       पापा को लिफ्ट से लेकर हम आई.सी.यू. में पहुचें। डॉक्टर ने उन्हें बेड पर लिटाया और सारे जरुरी उपकरण लगा दिए। तब मैंने चैन की साँस ली, पर जल्दी ही डॉक्टर ने बुलाया और कहा, कि “ये मेडिसिन और इन्जेक्शन जल्दी लाएँ।”
उन्होंने बताया कि “ये इन्जेक्शन ३००० का है और जल्दी से जल्दी लगना जरूरी है। यदि आप चाहें तो हमारे पास भी है, या आप खरीद कर ला दें।”
हमने डॉक्टर को कहा, “आप ही जल्दी से लगा दें।”
वे बोले “हम एसे नहीं लगा सकते, इसमें रिस्क है, कुछ भी हो सकता है, वैसे रिस्क के चांस  कम है, पर आपको पहले पेपर साइन करने होंगे।”
     मामा आ चुके थे, मुझे थोड़ी हिम्मत मिली, पर पेपर मुझे ही साइन करने थे, क्योंकि मैं ही मरीज के परिवार से बड़ी थी। मेरे हाथ काँप रहे थे, पापा को कुछ हो गया तो मैं सबको क्या जवाब दूंगी। फिर मैंने सोचा, कि मैं हिम्मत नहीं हार सकती, कुछ नहीं होगा पापा  को, कुछ नहीं होगा। मैंने ईश्वर से प्रार्थना की, मैं जैसे पापा को लायी, वैसे ही घर ले जाऊँ, इतनी कृपा करना। पेपर साइन करते ही डॉक्टर ने इन्जेक्शन लगाया और कहा “आज की रात रिस्की हैं, माइनर अटैक है फिर भी ध्यान रखना होगा। तब तक मामा, मासी, बुआ के बेटे आ चुके थे, सब पापा से मिले। सभी को हँसते हुए बोले, “मैं ठीक हूँ, चिंता न करें।”
पापा ने मम्मी के बारे में पूछा, मम्मी को बता दिया कि “साँस लेने में थोड़ी तकलीफ हो रहीं थीं, सिगरेट ज्यादा पीते हैं ना इसलिए। कल डिस्चार्ज कर देंगे।” सभी को सच बताने के लिए मना कर दिया, नहीं तो मम्मी को सम्भालना मुश्किल होता।
   पापा को इन्जेक्शन लग चुका था, वो तो पहले ही नॉर्मल थे, अब भी। तीनों भाई खाना खाने चले गए, मामा भी घर चले गए। और मैं बहुत सारी हिम्मत बांधे पापा के पास बैठी थी। उनके पास तो कोई डर था ही नहीं। हँसते हुए बोले, “जा शैला सो जा, कुछ नहीं हुआ, मैं ठीक हूँ।”
मेरे दिमाग में डॉक्टर की बात घूम रहीं थीं, कि आज की रात रिस्की है। मैं रातभर उन्हें देखती रही, और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करती रही। पापा के चेहरे पर रौनक थी, न कोई चिंता, न भय, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। सुबह ४ बजे के बाद पापा को नींद आने लगी।
डॉक्टर बोले, “अब ठीक हैं, चिंता की बात नहीं,” तो मेरी आँखों में आँसू आ गए। ईश्वर को धन्यवाद कहा। रातभर उन्हें देखती रहीं, कभी रोना भी आया तो उनके सामने नहीं रोई। उनमें बहुत हिम्मत थी, पर मैं उसे तोड़ना नहीं चाहती थी। सुबह तो सब लोग आ चुके थे, ४ दिन बाद पापा ठीक हो घर आ गए थे।
      तब हमने पूछा, “आपको बस में अटैक आया, बिना बताए डॉक्टर के पास भी चले गए, हमें बताना चाहिए था।
पापा बोले, “मैं फोन लगा कर बताता तो तुम सब कितना घबरा जाते, शांति से सब समस्या का हल निकलता है, अब सब ठीक हो गया।”
     इस घटना से हमने उनसे विकट परिस्थितियों में भी धैर्य रखने का सबक सीखा।

परिचय-शीला बड़ोदिया का साहित्यिक उपनाम ‘शीलू’ और निवास इंदौर (मप्र) में है। संसार में १ सितम्बर को आई शीला बड़ोदिया का जन्म स्थान इंदौर ही है। वर्तमान में स्थाई रूप से खंडवा रोड पर ही बसी हुई शीलू को हिन्दी, अंग्रेजी व संस्कृत भाषा का ज्ञान है, जबकि बी.एस-सी., एम.ए., डी.एड. और बी.एड. शिक्षित हैं। शिक्षक के रूप में कार्यरत होकर आप सामाजिक गतिविधि में बालिका शिक्षा, नशा मुक्ति, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, बेटी को समझाओ अभियान, पेड़ बचाओ अभियान एवं रोजगार उन्मुख कार्यक्रम में सक्रिय हैं। इनकी लेखन विधा-कविता, कहानी, लघुकथा, लेख, संस्मरण, गीत और जीवनी है। प्रकाशन के रूप में काव्य संग्रह (मेरी इक्यावन कविता) तथा १५ साझा संकलन में रचनाएँ हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी को स्थान मिला है। इनको मिले सम्मान व पुरस्कार में गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड सम्मान (साझा संकलन), विश्व संवाद केंद्र मालवा (मध्य प्रदेश) द्वारा सम्मान, कला स्तम्भ मध्य प्रदेश द्वारा सम्मान, भारत श्रीलंका सम्मिलित साहित्य सम्मान और अखिल भारतीय हिन्दी सेवा समिति द्वारा प्रदत्त सम्मान आदि हैं। शीलू की विशेष उपलब्धि गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में रचना का शामिल होना है। आपकी लेखनी का उद्देश्य साहित्य में उत्कृष्ट लेखन का प्रयास है। मुन्शी प्रेमचंद, निराला, तुलसीदास, सूरदास, अमृता प्रीतम इनके पसंदीदा हिन्दी लेखक हैं तो प्रेरणापुंज गुरु हैं। इनका जीवन लक्ष्य-हिन्दी साहित्य में कार्य व समाजसेवा है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“हिन्दी हमारी रग-रग में बसी है।”