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बुढ़ापा-सबसे बड़ा सत्य

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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बुढ़ापा आते ही सूरत-सीरत बदल जाती है,
नाम वही रहता है, पर जीवन की रीत बदल जाती है।

पहले हर काम फुर्ती से हो जाया करता था,
अब वही काम करते-करते दिन ढल जाता है।

हाथ जल्दी से उठते नहीं,
पैर लड़खड़ाकर राह पर चल पड़ते हैं।

घुटनों का दर्द दिन-ब-दिन बढ़ता जाता है,
कमर झुककर जैसे बोझ-सा बन जाता है।

तनकर खड़ा होना भी कठिन हो जाता है,
आँखों का उजाला धीरे-धीरे घट जाता है।

उठने-बैठने में अब सहारा लेना पड़ता है,
छोटी-छोटी बातों में थकान घेर लेती है।

शरीर साथ नहीं देता, यह मन समझाता है,
पर मन फिर भी कुछ करने को मचल जाता है।

सुनाई कम देता है, बात कहनी कठिन हो जाती है,
लोगों की दुनिया उनसे दूर-सी हो जाती है।

अपनी ही बात मन में दबानी पड़ती है,
चुप रहकर हर बात सहनी पड़ती है।

बच्चे बड़े होकर अपने कामों में रम जाते हैं,
समय के साथ उनके व्यवहार भी बदल जाते हैं।

दूसरों पर निर्भर रहना नियति बन जाती है,
यही बुढ़ापे का सबसे बड़ा सत्य कहलाता है।

फिर भी दिल पूरी तरह बूढ़ा नहीं होता,
यादों का दीपक मन में सदा ही जलता है।

परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है,
धैर्य के साथ जीवन को जीना पड़ता है।

यही जीवन की अटल सच्चाई कहलाती है-
बुढ़ापा हर इंसान के जीवन में आता है॥