ललित गर्ग
दिल्ली
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भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सबसे खतरनाक क्षण वह नहीं होता जब कोई व्यक्ति चोरी करता है, बल्कि वह होता है जब समाज चोरी को सामान्य मानने लगता है। जब रिश्वत को ‘सुविधा शुल्क’, कमीशन को ‘व्यवस्था’, राजनीतिक पहुंच को ‘सिफारिश’ और नियम तोड़ने को ‘काम निकालने की कला’ कहा जाने लगे, तब भ्रष्टाचार केवल कानून की समस्या नहीं रहता, वह सामाजिक संस्कार का संकट बन जाता है। उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से सामने आया कथित वीडियो इसी भयावह मानसिकता का प्रतीक बनकर हमारे सामने आया है। वीडियो में कुछ लोग नगर निगम की आय को आपस में बांटने की शपथ लेते दिखाई दिए। प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं और वीडियो की परिस्थितियों व प्रामाणिकता की जांच की जा रही है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जाना चाहिए, पर इस घटना का महत्व केवल इतना नहीं है कि उसमें कौन दिखाई दे रहा है और उन्होंने क्या कहा ? असली प्रश्न यह है कि क्या भ्रष्टाचार अब इतना निर्भीक हो गया है कि उसे छिपाने की बजाय उसके बंटवारे की भी शपथ ली जा सकती है ? अगर किसी सार्वजनिक संस्था से जुड़े लोग सार्वजनिक धन को निजी हिस्सेदारी की तरह देखने लगें तो यह लोकतंत्र के लिए अत्यंत गंभीर चेतावनी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २०१४ में भ्रष्टाचार के संदर्भ में ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ का संकल्प सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया था। उसके बाद भ्रष्टाचार के विरुद्ध अनेक संस्थागत और डिजिटल उपायों पर जोर दिया गया। केंद्र सरकार ने ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति दोहराई है, लोकपाल को भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों पर कार्रवाई के लिए वैधानिक भूमिका प्राप्त है और केंद्रीय सतर्कता आयोग की भूमिका निगरानी तथा निवारक सतर्कता में महत्वपूर्ण है। फिर भी प्रश्न बचा हुआ है-क्या कानून और तकनीक भ्रष्टाचार को खत्म कर सकते हैं, यदि भ्रष्टाचार की सामाजिक स्वीकार्यता बनी रहे ? भ्रष्टाचार का नुकसान केवल सरकारी खजाने को नहीं होता। उसका सबसे बड़ा शिकार वह सामान्य नागरिक होता है जो कतार में खड़ा है, कर देता है, नियमों का पालन करता है और बदले में अपनी ही व्यवस्था से न्याय चाहता है। जिस सड़क का निर्माण होना था, वह घटिया बनती है तो नागरिक उसका मूल्य चुकाता है। जिस अस्पताल में दवा उपलब्ध होनी चाहिए, वहाँ कमी होती है तो गरीब मरीज कीमत चुकाता है। जिस सरकारी कार्यालय में काम समय पर होना चाहिए, वहाँ रिश्वत मांगी जाती है तो ईमानदार नागरिक की गरिमा पर चोट होती है।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के २०२५ करप्शन परशेप्संस इंडेक्स में भारत को ३९/१०० अंक और १८२ देशों में ९१वां स्थान मिला। इसी संस्था के उपलब्ध ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर आँकड़ों में ३९ प्रतिशत सार्वजनिक सेवा उपयोगकर्ताओं ने पिछले १२ महीनों में रिश्वत देने की बात बताई थी, ये आँकड़े २०२० के एशिया सर्वे से संबंधित हैं, इसलिए इन्हें वर्तमान वर्ष की स्थिति का प्रत्यक्ष माप नहीं माना जाना चाहिए। आँकड़े हमें चेताते हैं, लेकिन उससे भी अधिक भयावह वह मानसिकता है जिसमें व्यक्ति भ्रष्टाचार का विरोध तब करता है जब वह स्वयं उसका शिकार बनता है। जब कोई काम पैसे देकर जल्दी हो जाता है, तो वही व्यवस्था हमें सुविधाजनक लगने लगती है। यहीं से भ्रष्टाचार को सामाजिक स्वीकृति मिलती है।
भ्रष्टाचार का एक चेहरा आर्थिक है, दूसरा सत्ता-संस्कृति का। राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल व्यक्तिगत सुविधा के लिए होना भी सार्वजनिक नैतिकता को कमजोर करता है। इसका एक दिखाई देने वाला उदाहरण धार्मिक स्थलों पर ‘अति विशिष्ट नागरिक’ (वीआईपी) दर्शन की संस्कृति है। देश के अनेक प्रमुख मंदिरों में सामान्य श्रद्धालु घंटों कतार में खड़ा रहता है, जबकि प्रभावशाली व्यक्ति विशेष व्यवस्था से दर्शन कर लेता है। यह प्रश्न केवल मंदिर-प्रबंधन का नहीं है, यह समानता की लोकतांत्रिक भावना का प्रश्न है। यदि सार्वजनिक व्यवस्था में पद, पैसा और पहुंच सामान्य नागरिक के अधिकार से ऊपर खड़े होने लगें तो लोकतंत्र का मूल भाव कमजोर पड़ता है। जरूरत इस बात की है कि विशेष परिस्थितियों-जैसे सुरक्षा, दिव्यांगता, बुजुर्गों या विशिष्ट आधिकारिक दायित्व को छोड़कर ‘अति विशिष्ट नागरिक’ संस्कृति को धीरे-धीरे समाप्त करने की दिशा में स्पष्ट मानक बनाए जाएं। लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं, कि कुछ लोग हमेशा आगे रहें और बाकी नागरिक हमेशा कतार में।
आज डिजिटल इंडिया ने अनेक सेवाओं को ऑनलाइन बनाया है। इससे पारदर्शिता बढ़ाने और प्रत्यक्ष संपर्क घटाने में मदद मिली है, पर जहाँ प्रक्रिया अस्पष्ट है, अधिकारी के पास अत्यधिक विवेकाधिकार है या शिकायत का प्रभावी समाधान नहीं है, वहाँ डिजिटल व्यवस्था के बावजूद भ्रष्टाचार के नए रास्ते निकल सकते हैं। जीएसटी जैसे जटिल कर-प्रशासन में भी पारदर्शिता, स्पष्ट नियम, जोखिम-आधारित जांच और अधिकारी की जवाबदेही अत्यंत जरूरी हैं। इसका अर्थ यह नहीं, कि पूरा विभाग भ्रष्ट है, बल्कि किसी भी बड़े प्रशासनिक तंत्र में व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि ईमानदार अधिकारी सुरक्षित रहे और भ्रष्ट आचरण छिपा न सके। भ्रष्टाचार का इलाज केवल छापे और निलंबन नहीं है। इलाज है-कम विवेकाधिकार, अधिक पारदर्शिता, समयबद्ध सेवा, डिजिटल ट्रैकिंग, स्वतंत्र शिकायत-निवारण और निश्चित जवाबदेही।
आज जरूरत एक नई शपथ की है। ऐसी शपथ जो केवल समारोह में न ली जाए, बल्कि हर दिन प्रशासनिक निर्णय में दिखाई दे-सरकारी पद सुविधा नहीं, जिम्मेदारी है। जनता से मिला अधिकार निजी लाभ का साधन नहीं, लोकसेवा का अवसर है। सार्वजनिक धन पर पहला अधिकार जनता का है। न रिश्वत लेंगे, न दिलाएंगे, न किसी भ्रष्ट व्यक्ति को संरक्षण देंगे। और यदि हमारे सामने भ्रष्टाचार होगा तो मौन रहना भी अपनी जिम्मेदारी से भागना माना जाएगा। राजनेताओं के लिए भी सबसे बड़ी कसौटी चुनाव जीतना नहीं, सार्वजनिक विश्वास को बनाए रखना होनी चाहिए। जब हम अपने बच्चे को कहते हैं-“किसी तरह काम करा लो”, जब हम नियम तोड़कर गर्व महसूस करते हैं, जब हम अपने परिचित के लिए नियम बदलवाना चाहते हैं, जब हम रिश्वत देकर अपना काम जल्दी करवाकर खुश होते हैं-तब हम उसी व्यवस्था को मजबूत करते हैं जिसकी शिकायत अगले दिन करते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई सरकार बनाम जनता की लड़ाई नहीं हो सकती। यह सरकार, प्रशासन, राजनीतिक दल, न्याय व्यवस्था, मीडिया, उद्योग और नागरिक-सभी की साझा जिम्मेदारी है। नागरिकों को सशक्त बनाइए और भ्रष्टाचार को उजागर कीजिए। यह दिशा महत्वपूर्ण है, क्योंकि भ्रष्टाचार तभी कमजोर होगा जब शिकायत करने वाला नागरिक स्वयं को असहाय नहीं, व्यवस्था का सक्रिय भागीदार महसूस करेगा।
गंगाजल हाथ में लेकर भ्रष्टाचार के बंटवारे की कथित शपथ यदि सच साबित होती है तो यह केवल कुछ व्यक्तियों का नैतिक पतन नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन के लिए एक कठोर चेतावनी होगी। और यदि वीडियो भ्रामक या संपादित पाया जाता है, तब भी ऐसी सामग्री का तेजी से फैलना बताता है कि भ्रष्टाचार को लेकर समाज में अविश्वास कितना गहरा है। अब समय है कि हम भ्रष्टाचार के खिलाफ केवल भाषण न दें, व्यवस्था को ऐसा बनाएं जिसमें भ्रष्टाचार करना कठिन, छिपाना असंभव और ईमानदारी से काम करना सहज हो, क्योंकि राष्ट्र की असली आजादी उस दिन होगी, जब किसी नागरिक को अपना अधिकार पाने के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।