ललित गर्ग
दिल्ली
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विश्व योग दिवस (२१ जून) विशेष…
आज जब पूरी दुनिया युद्धों, आतंकवाद, हिंसा, मानसिक तनाव, पर्यावरणीय संकट और नई-नई बीमारियों की चुनौतियों से घिरी हुई है, तब मानवता एक ऐसे मार्ग की तलाश में है जो केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा को भी संतुलित कर सके। ऐसे संक्रमणकाल में योग केवल एक व्यायाम पद्धति या स्वास्थ्य विज्ञान नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए आशा का प्रकाश-स्तंभ बनकर उभरा है। यही कारण है कि ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’
आज केवल भारत का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व का उत्सव बन गया है। भारत अनादिकाल से योग की भूमि रहा है। इस भूमि के कण-कण में ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और योगियों की साधना की सुगंध समाई हुई है। वैदिक ऋषियों से लेकर भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, आदि शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गांधी, श्री अरविन्द, आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ तक, सभी ने योग को जीवन के उत्कर्ष और मानव कल्याण का आधार माना। योग ने भारत की आध्यात्मिक चेतना को ही नहीं गढ़ा, बल्कि विश्व को यह संदेश भी दिया कि मनुष्य का वास्तविक विकास भीतर से प्रारंभ होता है।
आज विश्व जिस दिशा में बढ़ रहा है, वह चिंता का विषय है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष, आतंकवाद की घटनाएं, साम्प्रदायिक तनाव और हथियारों की बढ़ती होड़ मानव सभ्यता को भय और असुरक्षा की ओर धकेल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान और तकनीक ने अभूतपूर्व सुविधाएं दी हैं, लेकिन इनके साथ विनाश की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। ऐसे समय में योग की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। योग मनुष्य को भीतर से शांत, संतुलित और संवेदनशील बनाता है। जब व्यक्ति के भीतर शांति होगी, तभी समाज और राष्ट्र में शांति का वातावरण निर्मित होगा। योग का मूल अर्थ ही है-जोड़ना। यह मनुष्य को मनुष्य से, आत्मा को परमात्मा से, व्यक्ति को समाज से और मानवता को सम्पूर्ण सृष्टि से जोड़ता है। योग विभाजन नहीं, एकता का दर्शन है। इसलिए वह हिंसा, घृणा, आतंक और संघर्ष का स्वाभाविक प्रतिरोधक है। जो व्यक्ति योग के माध्यम से अपने भीतर करुणा, प्रेम और अहिंसा का विकास करता है, वह किसी के प्रति द्वेष नहीं रख सकता। यही कारण है, कि महात्मा गांधी की अहिंसा और भगवान महावीर का जीव-दया का संदेश भी योग की व्यापक चेतना से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज मानसिक तनाव, अवसाद, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, मोटापा और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। आधुनिक जीवन की भाग-दौड़ में मनुष्य बाहरी उपलब्धियों के पीछे दौड़ रहा है, लेकिन भीतर से खाली और अशांत होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में योग एक समग्र चिकित्सा-पद्धति के रूप में सामने आया है। योग शरीर, मन और भावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करता है। नियमित आसन, प्राणायाम और ध्यान व्यक्ति की प्रतिरक्षा शक्ति को बढ़ाते हैं, तनाव को कम करते हैं तथा मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाते हैं। आज भी चिकित्सक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्वीकार करते हैं कि योग अनेक बीमारियों की रोकथाम और प्रबंधन में अत्यंत प्रभावी सहायक माध्यम है। यह दवाओं का विकल्प नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन का आधार है।
योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल रोगों से मुक्ति नहीं देता, बल्कि जीवन को दिशा देता है। इसलिए योग केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और सामाजिक पुनर्निर्माण का भी अभियान है।
यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारत केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति बनने का सपना नहीं देखता, बल्कि मानवता को स्वस्थ, संतुलित और शांतिपूर्ण जीवन का मार्ग दिखाने की क्षमता भी रखता है। यही ‘विश्वगुरु भारत’ की अवधारणा का मूल है।
आज जब दुनिया रासायनिक दवाओं के दुष्प्रभावों और जीवन-शैली जनित रोगों से चिंतित है, तब योग और आयुर्वेद एक वैकल्पिक नहीं, बल्कि पूरक एवं स्थायी समाधान के रूप में उभर रहे हैं। इतिहास साक्षी है कि योग ने हर युग में एक मौन क्रांति को जन्म दिया है। इसने राजाओं को ऋषि बनाया, योद्धाओं को संत बनाया और सामान्य मनुष्यों को असाधारण व्यक्तित्व प्रदान किए। इसलिये योग दिवस उत्सव का नहीं, संकल्प का अवसर बने। यदि व्यक्ति स्वस्थ होगा तो परिवार स्वस्थ होगा, परिवार स्वस्थ होगा तो समाज स्वस्थ होगा और समाज स्वस्थ होगा तो राष्ट्र एवं विश्व भी स्वस्थ और शांतिपूर्ण बन सकेगा।