पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २०२१ में ‘विभाजन विभीषका स्मृति दिवस’ मनाने की घोषणा करके उन लाखों लोगों के संघर्ष, बलिदान और विस्थापन के दर्द को राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बना दिया है, क्योंकि आज की पीढ़ी उस दर्द की पीड़ा से अनजान है। विभाजन के उस दर्द को जानने के लिए हमें यह समझना है, कि यह आजादी हमें कितनी बड़ी मानवीय त्रासदी की कीमत चुकाने के बाद मिली है। 1940 के दशक में मुस्लिम लीग की माँग अधिक मुखर हो गई और १९४६ के घटनाक्रमों, कैबिनेट मिशन योजना की विफलता और फिर बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा ने परिस्थितियों को अत्यंत जटिल बना दिया था।
अंततः भारत और पाकिस्तान २ स्वतंत्र राष्ट्र घोषित हो गए थे, लेकिन उसके बाद ही जो मानवीय त्रासदी शुरू हुई;उसकी कल्पना सपने में भी किसी ने नहीं की थी।
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा था कि “देश का विभाजन उनके शरीर को २ टुकड़ों में बाँटने के समान होगा” लेकिन हिंसा की विकरालता और गृहयुद्ध की आशंका के सामने परिस्थितियाँ इतनी भयावह हो गईं कि काँग्रेस नेतृत्व ने अंततः विभाजन की योजना को स्वीकार कर लिया।
विभाजन की पीड़ा केवल आँकड़ों और संख्या से नहीं समझी जा सकती। हिंसा, हत्या और विस्थापन की अवर्णनीय घटनाओं ने लाखों परिवारों को तहस-नहस कर दिया।
विभाजन के दौरान ब्लड ट्रेन की स्मृतियाँ आज भी अनेक परिवारों के मौखिक इतिहास परंपरा का हिस्सा है। सबसे अधिक मर्मांतक पीड़ा महिलाओं ने झेली। अपहरण, बलात्कार, जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन, जबरन विवाह और परिवारों से बिछड़ जाने की अमानवीय घटनाएं बहुतायत में हुईं। करीब २ करोड़ लोग विस्थापित हुए और लगभग २० लाख मारे गए। विस्थापित परिवारों के पास शरणार्थी शिविर में रहने के सिवा कुछ नहीं था, लेकिन लोगों ने हिम्मत नहीं छोड़ी और अपनी मेहनत, उद्यमिता, आत्मसम्मान और शिक्षा का आधार बनाकर अपने नए सफ़र की शुरुआत की।
विपरीत परिस्थिति में संघर्ष करके नए भारत में अपना स्थान बनाया एवं राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि संपत्ति छीनी जा सकती है, लेकिन परिश्रम, साहस और आत्मसम्मान नहीं छीना जा सकता।
विभाजन की विभीषका हमें संदेश देती है, कि नफरत की राजनीति अंततः समाज को बाँटती है, जबकि संवाद, विश्वास और एकता राष्ट्र को मजबूत बनाते हैं। यह समृतियाँ बताती हैं, कि आजादी का उत्सव जितना गौरव का विषय है, उतना ही विभाजन की पीड़ा को याद करना भी जरूरी है। इसलिए जब हम सब १५ अगस्त को तिरंगा फहराएं तो केवल उत्सव नहीं, वरन् इसे स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानी और विस्थापितों के प्रति कृतज्ञता का पर्व भी समझना चाहिए।
आइए, हम सब उन पुरखों को नमन् करें; जिन्होंने अपना सब कुछ खोने के बाद भी भारत को अपना घर बनाया। इसलिए, विभाजन की विभीषका को याद रखें, परंतु इससे घृणा नहीं वरन् राष्ट्रीय एकता, सद्भाव और अखंड भारत एवं राष्ट्रीय चेतना की प्रेरणा लें।