राधा गोयल
नई दिल्ली
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“दादी! इस बार मेरे जन्मदिन पर मुझे पौधा लगाने के लिए मत कहना। मुझे बहुत पढ़ाई करनी है। पता है ना १२वीं क्लास में आ गया हूँ। अच्छे नंबर नहीं आयेंगे तो अच्छे कॉलेज में एडमिशन भी नहीं मिलेगा।” पोते ने कहा।
दादी- “बेटा! एक पौधा लगाने में कितनी देर लगती है ? तुझे पता है ना, कि विश्व में ग्लोबल वार्मिंग के कारण क्या कुछ हो रहा है। कितने ही देशों में बाढ़ के कारण लाखों लोग बेघर हो गए हैं।”
पोता- “पर दादी, इसमें मेरा क्या कसूर है ?”
“अरे, कौन कह रहा है कि तेरा कसूर है। मैं तो केवल इतना कह रही हूँ एक पौधा लगाने से तुझे क्या फर्क पड़ जाएगा। जानता है ना २०१३ में केदारनाथ त्रासदी आई थी और एक बार जब छोटे दादू कश्मीर गए थे… उन बातों को तो नहीं भूला होगा ना तू ? तब कश्मीर की बाढ़ में दादू-दादी फँस गए थे। सारे संचार माध्यम भी ठप्प हो गए थे। कहाँ है, कैसे हैं, कोई सूचना तक नहीं मिल पा रही थी। बाढ़ का कारण क्या था, क्या मालूम है ? सबसे बड़ा कारण था विकास के नाम पर विनाश… जंगल काटना… कंक्रीट के नगर बसाना।”
“कॉलोनी के और लोगों से क्यों नहीं बोलती हो कि पेड़ लगायें ?”
दादी- “बेटा! शुरुआत अपने घर से करनी होती है। यदि हम वाणी द्वारा नहीं; बल्कि अपने आचरण से ऐसा करके दिखाएं तो लोगों को ज्यादा प्रेरणा मिलती है।”
” क्या और किसी देश में ऐसा हो रहा है दादी ?”
“हाँ, हो रहा है। इंडोनेशिया में मौलवी कर रहे हैं पर्यावरण बचाने का प्रचार।”
“मगर आपने तो एक बार बताया था कि इंडोनेशिया में सबसे अधिक मुस्लिम लोग रहते हैं।”
“यही मैं तुझे बताना चाहती हूँ। यदि वे लोग ऐसा कर सकते हैं तो हम तो वृक्षों को ‘वृक्ष देवता’ कहते हैं। जानता है ना हमारे यहाँ वट सावित्री की पूजा भी होती है। मैं और मम्मी दोनों मन्दिर में उस दिन पूजा करने जाते हैं। हम पीपल को भी पूजते हैं। तुलसी जी को हम लोग ‘तुलसी माता’ कहते हैं।”
“तो क्या इन्डोनेशिया में लोगों ने पौधे लगाने शुरू कर दिए ?”
“बेटा,वहाँ तो बाकायदा फतवा जारी कर दिया गया है। पौधा नहीं लगाने पर मदरसों की डिग्री भी नहीं मिलेगी। इंडोनेशिया के मौलवी पर्यावरण प्रचारक बन गए हैं। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण की मुहिम छेड़ रखी है। पर्यावरण बचाने की इस मुहिम को ‘ईको इस्लाम आंदोलन’ कहा जा रहा है।”
पोता उत्सुकता से- “दादी! यह तो आप अच्छी जानकारी बता रही हो। अब आराम से बैठ कर पूरी बात सुनता हूँ। बताओ।”
दादी- “बेटा! इंडोनेशिया में मस्जिदों द्वारा स्कूल चलाए जाते हैं। मस्जिदों द्वारा चलाए जा रहे इन स्कूलों में करीब ४० लाख बच्चे पढ़ते हैं। उन्हें पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहाँ तक कि वहाँ ग्रेजुएट होने के लिए १ पौधा लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। बिना पेड़ लगाए डिग्री ही जारी नहीं होगी।”
“लेकिन उनको ऐसी जबरदस्ती क्यों करनी पड़ी ? वैसे तो अच्छी बात है कि इस बहाने बच्चे जबरदस्ती ही सही; लेकिन पेड़ लगायेंगे, पर मौलवियों में इतनी जागरूकता आई कैसे ?”
“ग्लोबल वार्मिंग और बाढ़ से इंडोनेशिया के अस्तित्व पर खतरा बढ़ रहा है। हर साल १० इंच जमीन समुद्र निगल रहा है। राजधानी जकार्ता से गुजरने वाली १३ नदियों में बाढ़ के हालात दिनों-दिन भयंकर होते जा रहे हैं। २०२० में आई बाढ़ में हजारों जानें चली गई थीं और ४ लाख लोग पलायन को मजबूर हुए थे। अब वर्ल्ड बैंक ने आशंका जताई है कि इस दशक के अंत तक ४२ लाख इंडोनेशियाइयों को बाढ़ की वजह से पलायन करना पड़ सकता है। इसी लिए वो इस आपदा से निपटने के लिए पहले से ही प्रबंध कर रहे हैं और कठोरता से इसे लागू भी कर दिया है।”
“फिर तो पेड़ लगाना बहुत जरूरी है। यदि समुद्र हर साल १० इंच जमीन निगल लेगा तो धीरे-धीरे करके वहाँ की सारी जमीन पर पानी ही पानी होगा। लोगों को रहने के लिए जगह नहीं होगी। ये तो मौलवी लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।पहले भी आपने बताया था कि अमेरिका में आई बाढ़ से कितने लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा था। वो कल सुनूँगा, अभी ये बात पूरी करो कि क्या केवल पेड़ लगाने से ग्लोबल वार्मिंग कम हो जाऐगी ?”
“नहीं बेटा,केवल इतने से काम नहीं चलने वाला, क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग का बड़ा भयानक संकट पूरे विश्व में छाया हुआ है। सभी अपने अपने स्तर पर अन्य विकल्प भी खोज रहे हैं। जैसा हमारे देश व अन्य कई देशों ने किया, अब इण्डोनेशिया वाले भी कर रहे हैं।”
“और क्या उपाय कर रहे हैं ?”
“इंडोनेशिया की १००० मस्जिदों में सोलर पैनल लगाए जा रहे हैं। मौलवी खुद ही स्मार्ट एनर्जी मीटर भी लगवा रहे हैं। वेस्ट रिसाइकिल करने की व्यवस्था भी की जा रही है। रिन्यूबल एनर्जी के लिए २४ हजार करोड़ का फंड रखा गया है।”
“दादी! मैं अपने जन्मदिन पर पौधा जरूर लगाऊँगा और आपके और दादू के जन्मदिन व शादी की सालगिरह पर भी। मम्मी, पापा और आपकी लाड़ली पोती को भी बोलूँगा कि वह भी ऐसा ही करें। अपने दोस्तों से भी कहूँगा। अपने स्कूल की टीचर को भी बोलूँगा कि महीने में १ दिन ऐसा रखें, जिस दिन हम सारे बच्चे १-१ पौधा लगाएँ।माली काका तो हमारे स्कूल में है। पानी देने का काम वह कर देगा, वरना समय निकालकर हम भी अपनी पानी वाली बोतल में पानी भरकर स्कूल से वापस आते समय अपने पौधे में पानी दे सकते हैं। हमें देखकर अच्छा भी लगेगा कि हमारा पौधा कितना बढ़ रहा है। उसके पास हम १ तख्ती पर पर्ची लगाकर अपना-अपना नाम भी लिखेंगे, जिससे पता लग सके कि यह पौधा किसने लगाया। बच्चों को देखकर खुशी होगी कि मेरा लगाया पौधा मुरझा गया या बढ़ रहा है।”
“मेरा प्यारा पोता” कहकर दादी ने पोते को गले से लगाया और उसके गाल तथा माथे पर बड़े स्नेह से चुंबन दिया।