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आषाढ़ का एक दिन और मल्लिका

शशांक मिश्र ‘भारती’
शाहजहांपुर(उत्तरप्रदेश)

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आषाढ़ का एक दिन मोहन राकेश जी का प्रथम ऐतिहासिक नाटक है,जो रंग शिल्प सम्बन्धी संभावनाओं के नए क्षितिज खोजता प्रतहत होता है। प्रत्येक लेखक का अपना जीवन दर्शन होता है,जिसे वह जीवन के विविध आयामों में स्पर्श करना चाहता है। मल्लिका आषाढ़ का एक दिन नाटक में मोहन राकेश जी की महत्वपूर्ण प्रस्तुति है। वह नाटक का एक महत्वपूर्ण पात्र ही नहीं,वरन् प्रेरणा का अपूर्व स्रोत भी है जिससे सन्देश लेकर कालीदास उज्जयिनी प्रस्थान कर पाते हैं तथा उसी की स्मृतियां उन्हें इच्छित लक्ष्य तक पहुंचाती भी हैं।

मल्लिका कहती है-“जानती हूँ कि कोई भी रेखा तुम्हें घेर ले, तुम घिर जाओगे। मैं तुम्हें घेरना नहीं चाहतीं। इसीलिए कहती हूँ जाओ और विश्वास करो तुम यहां से अलग नहीं होओगे। यहां की वायु,यहां के मेघ और यहां के हरिण। इन सबको तुम साथ ले जाओगे और मैं भी तुमसे दूर नहीं होऊंगी।”

मल्लिका की स्मृति धुंधली होने लगती है तो वही कालिदास जो साधारण कवि से राजकवि यहां तक कि कश्मीर के शासक का पद तक सुशोभित करते हैं,पुनः विपन्नावस्था में मल्लिका की शरण में आते हैं लेकिन इस बार मल्लिका मल्लिका न होकर एक अभावग्रस्त पीड़ित नारी दिखलाई पड़ती है। परिस्थितियों से विवश वह अपनी संतान को अभाव की संतान बतलाती हुई कहती है-“इस जीव को देखते हो ? पहचानते हो ? यह मल्लिका है जो धीरे-धीरे बड़ी हो रही है और माँ के स्थान पर अब मैं इसकी देखभाल करती हूँ। यह मेरे अभाव की संतान है,और जानते हो मैंने अपना नाम खोकर एक विशेषण उपार्जित किया है और अब मैं अपनी दृष्टि में नाम नहीं,केवल विशेषण हूँ।”

उसे उस विलोम के प्रति अपने को समर्पित करना पड़ता है जिसका कि वह चेहरा तक देखना पसन्द नहीं करती थी। शायद ऐसा कालिदास द्वारा उसकी उपेक्षा उज्जयिनी जाकर भूल जाना, गांव आकर भी उससे न मिलना सिर्फ प्रियगुंमजरी का आना है। उसकी सेवाओं का मूल्य धन-वैभव से चुकाना भी हो सकता है। गांव आने पर कालिदास के प्रति उसके विचार यूं थे-“आज वर्षों बाद तुम लौटकर आये हो। सोचती थी तुम आओगे तो उसी तरह मेघ घिरे होंगे,वैसा ही अंधेरा-सा दिन होगा,वैसे ही एक बार वर्षा में भीगूंगी और तुमसे कहूंगी कि देखो मैंने तुम्हारी सब रचनाएं पढ़ी हैं………..।”

मल्लिका एक साधारण नारी नहीं,वह सहृदयता की मूर्ति परिस्थितियों से विवश ममता की मूर्ति अन्तर्द्वन्द से ग्रस्त अभावों में पली बढ़ी है। उसने संकटों से जूझना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है,और इसीलिए दुःखों को अपने भाग्य का चक्र मानकर अपने-आपको विलोम के समक्ष समर्पित करती हुई कहती है-“तुम जीवन में तटस्थ हो सकते हो,परन्तु मैं तो अब तटस्थ नहीं हो सकती। क्या जीवन को तुम मेरी दृष्टि से देख सकते हो ?”

परिस्थितियां चाहें कितनी ही प्रबल क्यों न हों,मन की व्यथाएं कितनी ही क्यों न व्याप्त रही हों। उसने कभी कोई समझौता नहीं किया,बल्कि प्रियगुंमंजरी तक के आने पर उसके द्वारा दी जाने वाली अनेक राजसी सुख-सुविधाओं व लालसाओं को भी ठुकरा दिया,जो इस प्रकार व्यक्त है-“आप बहुत उदार हैं,परन्तु हमें ऐसे ही घर में रहने का अभ्यास है। इसलिए असुविधा नहीं होती।”

जहां तक ऐतिहासिक साहित्यिक ग्रन्थों का प्रश्न है तो उनमें महाकवि कालिदास और उनकी पत्नी का उल्लेख तो आता है,पर किसी प्रेयसी का नहीं। आषाढ़ का एक दिन नाटक में मल्लिका की बहुत सुन्दर कल्पना सृष्टि रही है। डॉ.लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय के अनुसार-नाटककार ने मल्लिका के रूप में सुन्दर नारी पात्र देने का प्रयास किया है,जो भावनात्मक प्रेम के आदर्श प्रारम्भ से अन्त तक लेकर चलती है। परिस्थितियां भले ही उसे उसका निर्वाह नहीं करने देतीं,फिर भी हरिण-सी भोली भावुक मल्लिका परिस्थितियों की शिकार होकर भी अपने कर्तव्य को पूर्ण करती दिखती है।

निष्कर्षतः मल्लिका एक काल्पनिक स्त्री पात्र होते हुए भी मोहन राकेश जी की एक विशिष्ट कला सृष्टि रही है,तथा भारतीय नारी के बिडम्बना पूर्ण जीवन की साकार प्रतिमूर्ति है,जिस पर मैथिलीशरण गुप्त की निम्न पंक्तियां सटीक बैठती हैं-

अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी,

आँचल में है दूध और आँखों में पानी।

 

परिचयशशांक मिश्र का साहित्यिक उपनाम-भारती हैl २६ जून १९७३ में मुरछा(शाहजहांपुर,उप्र)में जन्में हैंl वर्तमान तथा स्थाई पता शाहजहांपुर ही हैl उत्तरप्रदेश निवासी श्री मिश्र का कार्यक्षेत्र-प्रवक्ता(विद्यालय टनकपुर-उत्तराखण्ड)का हैl सामाजिक गतिविधि के लिए हिन्दी भाषा के प्रोत्साहन हेतु आप हर साल छात्र-छात्राओं का सम्मान करते हैं तो अनेक पुस्तकालयों को निःशुल्क पुस्तक वतर्न करने के साथ ही अनेक प्रतियोगिताएं भी कराते हैंl इनकी लेखन विधा-निबन्ध,लेख कविता,ग़ज़ल,बालगीत और क्षणिकायेंआदि है। भाषा ज्ञान-हिन्दी,संस्कृत एवं अंगेजी का रखते हैंl प्रकाशन में अनेक रचनाएं आपके खाते में हैं तो बाल साहित्यांक सहित कविता संकलन,पत्रिका आदि क सम्पादन भी किया है। जून १९९१ से अब तक अनवरत दैनिक-साप्ताहिक-मासिक पत्र-पत्रिकाओं में रचना छप रही हैं। अनुवाद व प्रकाशन में उड़िया व कन्नड़ में उड़िया में २ पुस्तक है। देश-विदेश की करीब ७५ संस्था-संगठनों से आप सम्मानित किए जा चुके हैं। आपके लेखन का उद्देश्य- समाज व देश की दशा पर चिन्तन कर उसको सही दिशा देना है। प्रेरणा पुंज- नन्हें-मुन्ने बच्चे व समाज और देश की क्षुभित प्रक्रियाएं हैं। इनकी रुचि- पर्यावरण व बालकों में सृजन प्रतिभा का विकास करने में है।