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इमरान खान से चमत्कार की उम्मीद

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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पाकिस्तान सरकार की इस घोषणा का कि वह मसूद अजहर के बेटे और भाई को नजरबंद कर रही है और हाफिज सईद के संगठनों पर फिर से प्रतिबंध लगा रही है,स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन जानना चाहता हूँ कि इन टोटकों से आतंकवाद खत्म कैसे होगा ? २०१४ में जब पेशावर के सैनिक विद्यालय के डेढ़ सौ बच्चों को आतंकियों ने मार डाला था,तब क्या नवाज शरीफ सरकार इसी तरह की घोषणाएं करती रही थी ? उस समय प्रधानमंत्री मियां नवाज़ शरीफ मक्का-मदीना की यात्रा पर गए थे। वे पाकिस्तान लौटते, उसके पहले ही पाकिस्तानी फौज ने सैकड़ों आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया। पूरे पख्तूनख्वाह-प्रांत में भगदड़ मच गई। अब जो आतंकियों की नजरबंदी की घोषणा इमरान सरकार ने की है,यदि उसे भरोसेलायक बनाना है तो मैं तो यह नहीं कि वह हजार-दो हजार लोगों की हत्या कर दे,बल्कि यह तो करे कि उनके सरगनाओं से सरे-आम टीवी चैनलों पर माफी मंगवाए, उनसे अपने गुनाहों को कुबूल करवाए और वे खुद अपने अपराधों के लिए सजा मांगें। अगर इमरान खान यह चमत्कारी काम करवा सकें तो एक क्या,सैकड़ों नोबेल पुरस्कार उनके चरण में लोटेंगे। तब ही वे ‘नए पाकिस्तान’ की नींव रखेंगे। तभी वे जिन्ना के स्वप्नों को साकार करेंगे। उनके विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने हामिद मीर को जो साक्षात्कार दिया है,वह इस दृष्टि से लाजवाब है लेकिन मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करवाने के सवाल पर उनकी जुबान लड़खड़ा रही थी,क्यों ? क्योंकि उन्हें विरोधी नेताओं का उतना नहीं,जितना फौज का डर है। फौज ने आतंकवादियों को अपना अग्रिम दस्ता बना रखा है। यह खेल बहुत मंहगा पड़ सकता है। २०१४ में पाकिस्तानी संस्थानों में यह भविष्यवाणी की गई थी। सभी से उस समय कहा था कि यह नरेंद्र मोदी हैं,अटलजी या मनमोहनजी नहीं हैं। इमरान भी इमरान हैं। वे चाहें तो नई लकीर खींच सकते हैं। उन्होंने पिछले दिनों अपने वाणी-संयम और उदारता से अपनी इज्जत बढ़ाई है। उन्होंने अपने पंजाब के सूचना और संस्कृति मंत्री फय्याजुल हसन चौहान को बर्खास्त करके अपनी छवि में चार चांद लगा लिये हैं। चौहान ने भारतीय हिंदूओं को ‘पत्थर पूजक और गौमूत्र पीनेवाला’ कहा था। धार्मिक सहिष्णुता की शायद यह अदभुत और पहली मिसाल पाकिस्तान ने पेश की है। यह आतंक की नहीं,प्रेम की भाषा है। यदि अब भी आतंकी खेल बंद नहीं हुआ तो दोनों देश तबाह हुए बिना नहीं रहेंगे। अब यदि दुबारा कोई पुलवामा हो गया तो वह मुठभेड़ संक्षिप्त और सीमित नहीं होगी। भारत और पाकिस्तान,दोनों देशों के ज्यादातर लोग शांति,सदभाव और उन्नति चाहते हैं। विश्वास है कि इमरान और कुरैशी बातों पर कुछ ध्यान देंगे।

परिचय-डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।