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उड़े रंग-गुलाल

बृजेश पाण्डेय ‘विभात’
रीवा(मध्यप्रदेश)
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उड़े हो रंग अबीर गुलाल।
युवा शिशु करते वृद्ध धमालll

होलिका है पावन त्यौहार।
लाल भाभी के गोरे गाल।
बरस रंगों की रही फुहार।
भीगती चोली और रुमाल।
उड़े हो रंग अबीर गुलाल…ll

बहे हृदय से प्रेम की धार।
विविध रंगी चुनर कर डाल।
मधुर बनें घर-घर जेवनार।
हुए हैं आज अंगांगि लाल।
उड़े हो रंग अबीर गुलाल…ll

अवध में आई होली आज।
प्रजा सँग खेले हैं प्रतिपाल।
रंग में डूबा राज समाज।
प्रेम अमर हुआ भरत भुआल।
उड़े हो रंग अबीर गुलाल…ll

भ्रमर वसन्त में हैं मदमात।
सभी की बहकी है अब चाल।
सरस मगन सुन्दर ये विभात
रखें न कोई मन में मलाल।
उड़े हो रंग अबीर गुलाल…ll

पतित कर्म से दूर हों आप।
अजब है होली भंग कमाल।
परुषता हरिए हृद सन्ताप।
मृदंग मंगल आनन्द ताल।
उड़े हो रंग अबीर गुलाल…ll