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काबुलःबैठे रहो और देखते रहो ?

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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भारत सरकार की अफगान नीति पर हमारे सभी राजनीतिक दल और विदेश नीति के विशेषज्ञ काफी चिंतित हैं। उन्हें प्रसन्नता है कि तालिबान भारतीयों को बिल्कुल भी तंग नहीं कर रहे हैं और भारत सरकार उनकी वापसी में काफी मुस्तैदी दिखा रही है। वह जो भी कर रही है,वह तो किसी भी देश की सरकार का अनिवार्य कर्तव्य है लेकिन उसके कर्तव्य की इतिश्री यहीं नहीं हो जाती है। अफगानिस्तान में भारतीय राष्ट्रहितों की रक्षा करना उसका पहला धर्म है। इस मामले में भारत सरकार लगातार चूकती हुई दिखाई पड़ रही है। विदेश मंत्री जयशंकर ने ताजा बैठक में जो सफाई पेश की है, वह बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं है। उनका कहना था कि तालिबान ने दोहा में जो समझौता किया था, उसका पालन नहीं हुआ है और भारत सरकार ने अभी तक ‘बैठे रहो और देखते रहो’ की नीति अपना रखी है। पता नहीं उस बैठक में आए नेताओं ने जयशंकर की इस मुद्दे पर खिंचाई की या नहीं ? उन्हें पूछना चाहिए था कि तालिबान और अफगान सरकार के बीच समझौता किसने करवाया था ? क्या भारत सरकार ने करवाया था ? वह समझौता अमेरिका ने करवाया था। समझौता लागू न होने पर अमेरिका को नाराज़ होना था लेकिन उसकी जगह आप नाराज़ हो रहे हैं ? यह नाराजी फर्जी है या नहीं ? अमेरिका का सर्वोच्च जासूसी अफसर विलियम बर्न्स काबुल जाकर तालिबान नेताओं से बात कर रहा है और आप दुम दबाए बैठे हैं। आपको तालिबान से क्या खतरा था ? क्या दोहा समझौते के बाद तालिबान ने एक भी भारत—विरोधी बयान दिया है ? काबुल की आम जनता तालिबान से जितनी डरी हुई है,उससे ज्यादा आप डरे हुए हैं। आप हामिद करजई और डाॅ. अब्दुल्ला जैसे भारत के परम मित्रों की मदद करने से भी डर रहे हैं। यदि आपकी यह दब्बू नीति कुछ हफ्ते और बनी रही तो निश्चय ही तालिबान को चीन और पाकिस्तान की गोद में बैठने के लिए आप मजबूर कर देंगे। ध्यान दें कि लंदन में हुई जी-७ की बैठक में अध्यक्ष ब्रिटिश सांसद टोम टगनधाट ने कहा है कि इस समूह में भारत को भी जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि अफगान-उथल-पुथल का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव भारत-जैसे देश पर ही पड़ेगा। यह कितनी बड़ी विडंबना है कि विदेश सेवा का एक अनुभवी अफसर हमारा विदेश मंत्री है और हमारे पड़ौस में हो रही इतनी गंभीर उथल-पुथल के हम मूक दर्शक बने हुए हैं। अफसोस तो हमारे राजनीतिक दलों के नेताओं पर ज्यादा है,जो अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। नौकरशाहों की नीति है-बैठे रहो और देखते रहो,लेकिन नेताओं की नीति है कि बैठे रहो और सोते रहो।

परिचय– डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।