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क्यों आवश्यक है समान नागरिक संहिता ?

ललित गर्ग
दिल्ली
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आजादी के अमृतकाल में समानता की स्थापना के लिए अपूर्व वातावरण बन रहा है, इसके लिए वर्तमान में समान नागरिक कानून की चर्चा बहुत ज्यादा है। यह भारत की बड़ी जरूरत है। समानता एक सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक लोकतांत्रिक मूल्य है। इस मूल्य की प्रतिष्ठापना के लिए समान कानून की अपेक्षा है। राष्ट्र का कोई भी व्यक्ति, वर्ग, सम्प्रदाय, जाति जब-तक कानूनी प्रावधानों के भेदभाव को झेलेगा, तब तक राष्ट्रीय एकता, एक राष्ट्र की चेतना जागरण का स्वप्न पूरा नहीं हो सकता। समान नागरिक संहिता दरअसल एक देश एक कानून की अवधारणा पर आधारित है। समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) के अंतर्गत देश के सभी धर्मों, पंथों और समुदायों के लोगों के लिए एक ही कानून की व्यवस्था का प्रस्ताव है। भारत के विधि आयोग द्वारा संहिता को लेकर सुझाव आमंत्रित किए जाने के बाद इस पर बहस फिर से उग्र रूप से शुरू हो गई है। संहिता में संपत्ति के अधिग्रहण और संचालन, विवाह, उत्तराधिकार, तलाक और गोद लेना आदि को लेकर सभी के लिए एक समान कानून बनाया जाना है।
संहिता को लेकर भी एक ऐसा डर बन गया है, जिससे देश की सियासत को धर्मों में बांटने की कोशिशें की जा रही हैं। सियासत में ध्रुवीकरण की राजनीति जमकर हो रही है। बेहतर यही होगा कि, मुस्लिम समाज अपनी गलतफहमियों को दूर करे। यद्यपि भारतीय संविधान में सभी को अपना धर्म मानने और उसका प्रचार करने की आजादी दी गई है। मजहब भले ही अलग-अलग हों, लेकिन देश एक है। ऐसे में यह सवाल उठना भी लाजमी है कि, एक देश में अलग-अलग धर्मों के हिसाब से अलग-अलग कानून कैसे औचित्यपूर्ण हो सकते हैं, फिर बवाल क्यों ? मुस्लिम भी समाज का एक हिस्सा है, जिसे इसी रूप में प्रस्तुत करने की परिपाटी चलन में आ जाए तो भेद करने वाले विचारों पर लगाम लगाई जा सकती है, लेकिन हमारे देश के कुछ राजनीतिक दलों ने मुसलमानों को ऐसे भ्रम में रखने के लिए प्रेरित किया कि वह भी ऐसा ही चिंतन करने लगा, जबकि सच्चाई यह है कि आज के मुसलमान बाहर से नहीं आए, वे भारत के ही हैं। परिस्थितियों के चलते उनके पूर्वज मुसलमान बन गए। वे सभी स्वभाव से आज भी भारतीय हैं और विचार से सनातनी हैं, लेकिन देश के राजनीतिक दल अपने राजनीतिक लाभ एवं मत बैंक के चलते मुसलमानों के इस सनातनी भाव को प्रकट करने का अवसर नहीं दे रहे।
भारत विविधताओं से भरा देश है। यहाँ विभिन्न पंथों व पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग रहते हैं। इन सबके शादी करने, बच्चा गोद लेने, जायदाद का बंटवारा करने, तलाक देने व तलाक उपरांत तलाकशुदा महिला के जीवन-यापन हेतु गुजारा भत्ता देने आदि के लिए अपने-अपने धर्मानुसार नियम, कायदे व कानून हैं। इन्हीं नियमों, कायदे व कानूनों को पर्सनल लॉ कहते हैं। अंग्रेज जब भारत आए और उन्होंने यह विविधता देखी, तो उस समय उन्हें लगा पूरे देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए एक समान नागरिक आचार संहिता बनानी आवश्यक है। जब उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की तो हर धर्मों के लोगों ने इसका विरोध किया। ऐसे में उन्होंने लम्बे समय तक यहाँ अपने पाँव जमाए रखने के लिए किसी से उलझना ठीक नहीं समझा। इन परिस्थितियों में १८६० में उन्होंने इंडियन पैनल कोड तो लागू किया, पर इंडियन सिविल कोड नहीं। यानि एक देश-एक दंड संहिता तो लागू की, लेकिन एक देश-एक नागरिक संहिता लागू करने का जिम्मेदारी एवं साहसपूर्ण काम नहीं किया। उसके बाद बनी सरकारों ने तो अंग्रेजों की सोच एवं नीतियों का ही अनुसरण किया, इसलिए अपने राजनीतिक हितों के लिए इसे लागू नहीं किया।
आज जब भारत विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर है, जी-२० देशों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत कर रहा है, भारत की अहिंसा एवं योग को दुनिया ने स्वीकारा है, विश्व योग दिवस एवं विश्व अहिंसा दिवस जैसे आयोजनों की संरचना हुई है। इन सब सकारात्मक स्थितियों को देखते हुए भारत की कानून विषयक विसंगतियों को दूर करना अपेक्षित है, क्योंकि विश्व के कई देशों में समान नागरिक संहिता का पालन में होता है, लेकिन भारत में राजनीतिक फायदे के लिए तुष्टिकरण का ऐसा खेल खेला गया, जो विविधता में एकता एवं वसुधैव कुटुम्बकम के दर्शन को तार-तार कर रहा है। निजी कानूनों के कारण कहीं-कहीं विसंगति के हालात भी पैदा हो रहे हैं।
वर्तमान में हम देख रहे हैं कि कुछ लोग समान नागरिक कानून का विरोध कर रहे हैं, जबकि मुस्लिम समाज की महिलाएं इस कानून के समर्थन करने के लिए आगे आ रही हैं। १९८५ में शाहबानो प्रकरण के बाद समान नागरिक संहिता का मामला सुर्खियों में आया था। उच्चतम न्यायालय ने तलाक के बाद शाहबानो के पूर्व पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा था कि पर्सनल लॉ में समान नागरिक संहिता लागू होना चाहिए। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने अदालत के फैसले को पलटने के लिए संसद में बिल पारित कराया था। इस कानून के समर्थकों का मानना है कि अलग-अलग धर्मों के अलग कानून से न्यायपालिका पर बोझ पड़ता है। नागरिक संहिता लागू होने से इस परेशानी से निजात मिलेगी और लंबित मामलों के फैसले जल्द होंगे। देश में हर भारतीय पर एक समान कानून लागू होने से राजनीति पर भी असर पड़ेगा और राजनीतिक दल मत बैंक वाली राजनीति नहीं कर सकेंगे। नागरिक संहिता लागू होने से भारत की महिलाओं की स्थिति में भी सुधार आएगा। कुछ धर्मों के पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं। इतना ही नहीं, महिलाओं का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में भी एक समान नियम लागू होंगे।
संविधान निर्माताओं की मंशा थी कि अलग-अलग धर्म के लिए अलग-अलग कानूनों के बजाय सभी नागरिकों के लिए धर्म, जाति भाषा क्षेत्र और लिंग निरपेक्ष एक ‘भारतीय नागरिक संहिता’ लागू होना चाहिए, लेकिन भारत में जब भी संहिता की बात उठती है तो उसका इस आधार पर विरोध किया जाता है इसके आधार पर वर्ग विशेष को निशाना बनाने की कोशिश है। इसके विरोध में तरह-तरह के कुतर्क दिए जाने लगे हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश की मानें तो समान नागरिक संहिता पर आयोग की पहल मोदी सरकार के ध्रुवीकरण का एजेंडा है। क्या वह यह कहना चाहते हैं कि संविधान निर्माताओं ने ध्रुवीकरण के किसी एजेंडे के तहत ही अनुच्छेद ४४ में यह लिखा था कि देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना सरकार का दायित्व है ? कांग्रेस को इस प्रश्न पर विचार करने के साथ ही इस पर शर्मिंदा होना चाहिए कि स्वतंत्रता के बाद सबसे लंबे समय तक शासन करने के बाद भी वह संहिता के मामले में संविधान निर्माताओं की इच्छा का पालन नहीं कर सकी।
अगर हम यह चिंतन भारतीय भाव से करेंगे तो स्वाभाविक रूप से यही दिखाई देगा कि समान नागरिक कानून देश और समाज के विकास का महत्वपूर्ण आधार बनेगा। अगर इसे हिन्दू-मुस्लिम के संकुचित भाव से देखेंगे तो खामी न होने के बाद भी खामियाँ दिखाई देंगी। मौजूदा सरकार पूरे देश में हर नागरिक को समान अधिकार देने के पक्ष में है, वह पुरुष हो या महिला। ऐसा होगा तभी देश में सामाजिक समरसता की स्थापना संभव हो सकेगी। लोक राज्य, स्वराज्य, सुराज्य, रामराज्य का सुनहरा स्वप्न भेदपूर्ण कानून व्यवस्था की नींव पर कैसे साकार होगा ? यहाँ तो सब अपना-अपना साम्राज्य खड़ा करने में लगे हैं।

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