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ग्रेटा को पुरस्कार और उसकी प्रतिबद्धता

अजय बोकिल
भोपाल(मध्यप्रदेश) 

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स्वीडन की किशोर जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग द्वारा प्रतिष्ठित ‘नाॅर्डिक काउंसिल एनवायरनमेंट प्राइज’ को ठुकराना और यह कहना कि जलवायु आंदोलन के लिए विज्ञान को सुनने की जरूरत है,न कि अवाॅर्ड लेने की,उसे अपनी पीढ़ी के उन तमाम युवाओं से अलग करता है,जो दुनिया को बचाने के लिए जुटे हैं। ग्रेटा पर्यावरण को बचाने और जलवायु में हो रहे विनाशकारी परिवर्तनों से सचेत करने के लिए बचपन से ही काम कर रही है। १९ वर्षीय ग्रेटा ने जिस हिम्मत और तड़प के साथ पिछले साल संयुक्त राष्ट्र संघ में पूरी दुनिया के नेताओं को लताड़ लगाई थी,उसने विश्व में जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को प्रभावी ढंग से रेखांकित किया था।
ग्रेटा ने अपने भाषण में इन नेताओं पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से निपटने में नाकाम होने तथा नई पीढ़ी के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया। ग्रेटा ने सीधा सवाल किया कि आपने ऐसा करने की हिम्मत कैसे की ? ग्रेटा ने कहा कि युवाओं को समझ में आ रहा है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर आपने हमें छला है। अगर अभी भी आपने कुछ नहीं किया तो युवा पीढ़ी आपको माफ नहीं करेगी। ग्रेटा ने कहा कि आपने हमारे सपने,हमारा बचपन अपने खोखले शब्दों से छीना। हम सामूहिक विलुप्ति की कगार पर हैं और आप (अभी भी) पैसों व आर्थिक विकास की काल्पनिक कथाओं के बारे में बातें कर रहे हैं। (ध्यान रखें )भविष्य की पीढ़ियों की नजरें आप पर हैं और यदि आप हमें निराश करेंगे तो मैं कहूंगी कि हम आपको कभी माफ नहीं करेंगे।
मलाला के बाद ग्रेटा दूसरी ऐसी किशोरी है, जिसने अपनी हिम्मत और प्रतिबद्धता (कमिटमेंट)से पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। ग्रेटा को यह हिम्मत और प्रेरणा कहां से मिली ,कैसे मिली,गुड़ियों से खेलने की उम्र में ही उसे ग्लोबल वार्निंग जैसे मसलों की समझ कैसे है ? इन सवालों के जवाब ढूंढने से पहले जान लें कि स्टाॅकहोम में जन्मी ग्रेटा आॅपेरा गायिका माँ मालेना अर्नमैन और अभिनेता पिता स्वांते थनबर्ग की संतान है। उसके दादा भी जाने-माने अभिनेता थे,लेकिन ग्रेटा ने अभिनय या संगीत के बजाए धरती को बचाने का बीड़ा उठाया और इसके लिए कार्यकर्ता बनना तय किया। ग्रेटा जब १५ साल की थी,तभी उसने स्वीडिश संसद के सामने प्रदर्शन शुरू कर दिया था। उसके हाथ में एक तख्‍ती होती थी,जिस पर लिखा होता था ‘स्कूल स्ट्राइक फाॅर क्लायमेट।‘ जल्द ही उसने इसे आंदोलन में बदल दिया। ग्रेटा शुक्रवार को स्कूल नहीं जाती। इसलिए आंदोलन का नाम रखा गया ‘फ्रायडेज फाॅर फ्यूचर।‘ आज लाखों बच्चे इस आंदोलन से जुड़े हैं। ग्रेटा ने जलवायु संरक्षण की शुरूआत घर से ही की।
ग्रेटा जिस मुद्दे को लेकर इतनी मुखर और चिंतित है,वह है क्या ? ग्रेटा का आंदोलन किसी सत्ता,लाभ अथवा निजी संतुष्टि के लिए नहीं है। उसकी ‍चिंता के केन्द्र में समूची मानव सभ्यता और इस सभ्यता को जीवित रहने के लिए जरूरी अनुकूल पर्यावरण और जलवायु का संरक्षण है। इसी को ‘ग्लोबल वार्मिंग’ भी कहते हैं। इस धरती पर जलवायु परिवर्तन तो साढ़े ६ लाख साल से होते रहे हैं,जिसमें हिम युग भी शामिल है,लेकिन आधुनिक जलवायु युग की शुरूआत साढ़े ७ हजार(आधु‍निक मनुष्य सभ्यता का आरंभ) वर्षों से मानी जाती है,पर भौतिकवादी जीवन शैली,सुख सुविधाओं की हवस तथा औद्योगिक विकास बीते डेढ़ सौ सालों में पृथ्वी के जलवायु में विनाशकारी बदलावों का कारण बनने लगा। वातावरण में बढ़ते कार्बन उत्सर्जन तथा ग्रीन हाउस गैसों (जैसे कि कार्बन डाय आक्साइड,मिथेन और नाइट्रस आक्साइड आदि) के कारण पृथ्वी का औसत तापमान आज ०.९ डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। पहाड़ों पर बर्फ तेजी से ‍पिघलने लगी है। समुद्र सतह अपनी मर्यादा लांघकर औसतन ८ इंच ऊपर उठ गई है। जंगल नष्ट हो रहे हैं। प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। यानि कुछ सालों में पृथ्वी मनुष्य के रहने लायक ही नहीं रह जाने वाली है। इस विनाश में बहुत बड़ी भूमिका उन देशों की है,जो वि‍कसित और अमीर कहलाते हैं। वो पर्यावरण बचाने और ग्लोबल वार्मिंग की नसीहतें दूसरो को तो देते हैं,लेकिन खुद कुछ नहीं करना चाहते,क्योंकि इससे उनके हितों को ठेस पहुंचेगी।
ग्रेटा की लड़ाई ऐसे ही देशों और उनके नेताओं के खिलाफ है,जो जलवायु परिवर्तन को लेकर दोहरी नीति पर चलते हैं। ग्लोबल वार्मिंग पर चिंता जताना उनके लिए एक फैशन की तरह है,जबकि आज इस बात की नितांत जरूरत है कि इस धरती और उसके पर्यावरण को बचाने के लिए सभी एक स्वर में बोलें और कदम लें। ग्रेटा की बातों में नई पीढ़ी का आक्रोश बरसता है। हालांकि,उसके आंदोलन से अपने ही स्वार्थों में डूबी दुनिया कितनी प्रभावित होगी,कहना मुश्किल है, लेकिन उससे एक जागरूकता और नई पीढ़ी की अपने ही वजूद को लेकर चिंताएं परिलक्षित होती हैं। यूएन में अपने भाषण के बाद उसने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मिलने से इंकार कर दिया था।
ग्रेटा को जो पुरस्कार मिला है,वह कोई छोटा-मोटा नहीं है। फिर भी उसने इसे नकारने की हिम्मत दिखाई तो इसके पीछे उसकी अपने लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता है,न कि मान सम्मान पाने की भूख। यूँ ग्रेटा को छोटी से उम्र में ही कई बड़े पुरस्कार मिल चुके हैं। इस साल शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए भी वह नामांकित हुई थी। खास बात यह है कि ग्रेटा को ग्लोबल वार्मिंग से जूझने के ‍लिए ‍विज्ञान की ताकत पर भरोसा है। ये बात अलग है कि,इस ग्लोबल वार्मिंग के लिए काफी हद तक विज्ञान भी जिम्मेदार है। ग्रेटा का आशय विज्ञान द्वारा मनुष्य सभ्यता और पृथ्वी का पर्यावरण बचाने के लिए दी जाने वाली गंभीर चेतावनियां हैं। उन्हें उतनी ही गंभीरता से लेकर धरती को बचाने के लिए जरूरी कदम उठाने की जरूरत है,बजाए ‘तेरा-मेरा’ करने के। ग्रेटा का पर्यावरण पुरस्कार ठुकराना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि पृथ्‍वी को बचाने के लिए उसका अटूट जज्बा,क्योंकि अगर आने वाले समय में धरती मनुष्य के रहने लायक बची तो ग्रेटा जैसे लाखों युवाअों के जज्बात और प्रतिबद्धता के कारण ही बचेगी। ईश्वर करे कि ऐसा हो। आखिर एक आदिवासी समुदाय ने ग्रेटा को ‘स्वर्ग से उतरी नारी’ का खिताब यूँ ही नहीं दे दिया। अब यह हम पर है कि हम इस धरती को बचाने,सहेजने को लेकर कितने ईमानदार है,क्योंकि यह लक्ष्य अपने क्षुद्र स्वार्थों को अलग रखकर ही संभव है। ग्रेटा ने एक मुहिम शुरू की है, समूची मानवता की ‘ग्रेटनेस’ के ‍लिए।